दोस्त की बहन की सील तोड़ दी

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मेरा नाम हर्षित है मैं पटना का रहने वाला हूं लेकिन मैं दिल्ली में ही कई वर्षों से काम कर रहा हूं, मेरी उम्र 27 वर्ष है। मैं अपने स्कूल की पढ़ाई के बाद ही दिल्ली आ गया था। मैंने दिल्ली में बहुत मेहनत की और अब जाकर मैं थोड़े बहुत पैसे कमाने लगा हूं। जब मैं दिल्ली आया तो उस वक्त मेरी उम्र 18 वर्ष थी और अब मुझे दिल्ली में 9 वर्ष हो चुके हैं लेकिन इस बीच में मैंने बहुत ही उतार-चढ़ाव देखे, कई बार मैं खाली भी बैठा रहा। जब मेरे पास कोई काम नहीं था उस वक्त मेरे दोस्तों ने मेरी बहुत मदद की। दिल्ली में मेरी बहुत अच्छी दोस्ती हो चुकी है और वह लोग मेरी बहुत मदद करते हैं, मुझे उन्होंने हमेशा ही आर्थिक रूप से मदद की है क्योंकि वह लोग घर से संपन्न है इसलिए वह मेरी मदद कर पाए। मेरे जितने भी दोस्त हैं वह सब दिल्ली के ही रहने वाले हैं और मुझे भी उनके साथ रहना अच्छा लगता है। मैं एक बड़े शोरूम में काम करता हूं और मुझे अब अच्छी तनख्वाह मिलती है।

मैं जब पटना में था तो मेरे घर वालों की स्थिति बिल्कुल भी ठीक नहीं थी क्योंकि वह आर्थिक रूप से बहुत कमजोर हैं इसीलिए मैंने फैसला किया कि मैं अब दिल्ली चला जाता हूं लेकिन जब से मैं दिल्ली आया उसके बाद से मैं कभी घर नहीं गया। मैं अपने माता पिता को समय पर पैसे भिजवा देता हूं, जिससे की उनका खर्चा चल जाया करता है। मेरे पिताजी भी छोटा-मोटा काम कर के अपना घर का खर्चा निकालते हैं और कुछ पैसे मैं उन्हें भिजवा देता हूं। मेरे पिताजी का एक दिन मुझे फोन आया और कहने लगे कि तुम बहुत समय से दिल्ली में ही हो, तो तुम कुछ दिनों के लिए पटना आ जाओ, मैंने उन्हें कहा कि मैं वहां आकर क्या करूंगा क्योंकि मुझे अब दिल्ली में ही रहने की आदत हो चुकी है इसलिए मैं कहीं भी नहीं जाना चाहता हूं लेकिन वह मुझसे जिद करने लगे तो मैंने उन्हें कहा कि ठीक है मैं पटना आ जाता हूं।

मैंने कुछ दिनों के लिए अपने मैनेजर से छुट्टी ले ली और जब मैं पटना जाने की तैयारी कर रहा था तो मेरे दोस्त मुझसे पूछने लगे कि तुम इतने वर्षों बाद अपने घर जा रहे हो तो तुम्हें कैसा महसूस हो रहा है, मैंने उन्हें कहा कि मुझे अपने घर की बिल्कुल भी याद नहीं आती क्योंकि अब मुझे दिल्ली में ही रहना अच्छा लगता है इसलिए मैं अब दिल्ली में ही रहना चाहता हूं लेकिन मुझे घर जाना ही था इसलिए मैं जब घर जाने की तैयारी करने लगा तो उसमें मेरे दोस्तों ने मेरी मदद की। मैंने अपनी मां के लिए भी कुछ साड़ियां ले ली थी और अपने पिताजी के लिए भी कुछ सामान खरीदा था। मैंने ट्रेन की रिजर्वेशन करवा दी और मैं जब ट्रेन में बैठा हुआ था तो उस वक्त मैं यही सोच रहा था कि मैं इतने वर्षों बाद पटना जा रहा हूं तो क्या मुझे मेरे घरवाले पहचान पाएंगे क्योंकि हमारी शक्ल ही बदल चुकी है। जब मैं पटना से दिल्ली आया था उस वक्त मेरे चेहरे पर बिल्कुल भी दाड़ी नहीं थी लेकिन अब मेरी दाढ़ी और मूंछ आ चुके हैं और मेरा शरीर पूरी तरीके से बदल चुका है। जब मैं अपने घर पहुंचा तो मुझे मेरे माता-पिता ने वाकई में नहीं पहचाना, वह मुझसे पूछने लगे की तुम्हें किस के घर जाना है, मैंने उन्हें बताया कि मैं हर्षित हूं। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं हर्षित हूं तो वह दोनों ही मेरे गले लग गए और वह बहुत ज्यादा भावुक हो गए थे। मैंने उन्हें कहा कि मैं भी आप लोगों से मिलकर बहुत खुश हूं। मेरे पिताजी ने मेरा सामान उठा कर मेरे कमरे में रख दिया और जब मैंने अपने कमरे का दरवाजा खोला तो उसमें अब भी वही सामान था और वैसा ही था जैसा मैं छोड़ कर गया था। मेरी मां कहने लगी कि मैं हमेशा ही घर की सफाई करती थी लेकिन मैंने तुम्हारा सामान कभी भी नहीं छुआ, तुम जैसा अपना सामान रख कर गए थे वह वैसा ही है। मैंने अपनी मेज पर देखा तो वहां पर मेरी स्कूल की किताबें अभी भी वैसे ही रखी हुई थी जैसे पहले थी। मैं अपने पुराने दिन याद करने लगा और सोचने लगा कि मैं कैसे घर से चला गया था। उस वक्त मैंने पता नहीं कैसे हिम्मत करते हुए दिल्ली जाने का फैसला कर लिया। मुझे ध्यान है कि मेरे स्कूल में मेरे कुछ दोस्त थे, मैंने जब अपने पिताजी से पूछा कि मेरे स्कूल में मेरे कुछ दोस्त थे, जो मेरे हमारे घर पर भी आते थे, तब वह कहने लगे कि मुझे तो वह लोग कम ही मिलते है परंतु मुझे राजीव अक्सर मिल जाता है।

मैंने उनसे पूछा कि राजीव आपको कहां मिला था, वह कहने लगे कि राजीव अभी भी अब हमारे पड़ोस में ही रहता है और उसके पिताजी ने यहीं पर घर बना लिया है। मैंने जब अपने पिताजी से कहा कि उनका घर कहां पर है  आप मुझे बता दीजिए, उन्होंने मुझे उनके घर का रास्ता बता दिया और मैं पूछते पूछते राजीव के घर तक पहुंच गया। जब मैं राजीव के घर पहुंचा तो मैंने उनके घर की बैल बजाई, राजीव की मां ने दरवाजा खोला और वह मुझे पहचान नहीं पाई। मैंने उन्हें कहा कि राजीव घर पर है, वह कहने लगी हां राजीव तो घर पर ही है। वह मुझसे पूछने लगी क्या आपको कुछ काम था, मैंने उन्हें बोला कि आप मेरी मुलाकात एक बार राजीव से करवा दीजिए, वह मुझे पहचान लेगा। जब उसकी मां ने राजीव को बुलाया तो राजीव बाहर आया लेकिन वह मुझे पहचान नहीं पाया। मैंने जब उसे याद दिलाया कि मैं हर्षित हूं तो वह बहुत खुश हो गया और कहने लगा कि तुम तो इतने सालों बाद वापस घर लौटे हो, मैं कहने लगा कि घर की स्थिति ही कुछ ऐसी हो गई थी इसलिए मुझे दिल्ली जाना पड़ा। वह मुझसे कहने लगा कि तुम यहां बाहर क्यों खड़े हो, घर के अंदर चलो। वह मुझे अपने घर के अंदर ले गया और जब हम लोग बात कर रहे थे तो उसकी बहन भी बाहर आ गई, जब हम लोग स्कूल में पढ़ते थे तो उसकी बहन बहुत छोटी थी। मैंने उसकी बहन का नाम पूछा, राजीव कहने लगा कि यह शालिनी है।

मैंने शालिनी से कहा कि तुम तो उस वक्त बहुत ही छोटी थी जब हम लोग स्कूल में पढ़ते थे, हम तीनो ही बैठ कर बात कर रहे थे और कुछ देर बाद उसकी मां भी हमारे साथ आकर बैठ गई। वह मुझसे पूछने लगी कि क्या तुम हर्षित हो, मैंने उन्हें कहा कि हां मैं हर्षित हूं। राजीव की मां कहने लगी कि तुम तो बिल्कुल ही बदल चुके हो, तुम बिल्कुल भी पहचान में नहीं आ रहे, मैंने उन्हें कहा कि अब काफी समय बाद घर लौटूंगा तो कौन पहचानेगा। वह मेरे लिए चाय बनाने के लिए चली गई और शालिनी भी उनके साथ चली गई, मैं और राजीव आपस में बैठकर बातें कर रहे थे। उस दिन मैंने उसके साथ बहुत बात की और उनके घर पर मैंने चाय भी पी। उसके बाद मैं अपने घर पर चला गया, मैंने राजीव से कहा कि जब तुम्हें समय मिले तो तुम मेरे घर पर आ जाना, वह कहने लगा ठीक है मैं तुम्हारे घर पर आ जाऊंगा। जब मैं अपने घर गया तो मैं सोचने लगा कि यहां पर तो सब कुछ बदल चुका है और मैं इतने बरसों बाद आया तो मुझे कोई भी नहीं पहचान पा रहा है। अब मैं अपने घर पर ही था और मेरे माता-पिता के साथ उस दिन मैंने बहुत बात की, वह लोग मुझसे बात कर के बहुत खुश हो रहे थे और कई दिनों तक राजीव हमारे घर पर नहीं आया तो मैं ही उसके घर चला गया। जब मैं उसके घर गया तो वह मुझे कहने लगा कि मुझे बिल्कुल भी समय नहीं मिल पाया इसलिए मैं तुम्हारे घर पर नहीं आ पाया। उस दिन वह बहुत जल्दी में था और कहने लगा कि तुम घर पर बैठो, मैं थोड़ी देर बाद आता हूं। मैं उस दिन उसके घर पर ही बैठा हुआ था, उसकी मां और शालिनी घर पर थे, वह दोनों ही मुझसे बात कर रहे थे। कुछ देर बाद वह भी अपने काम पर लग गये और मैं अकेला ही बैठा हुआ था लेकिन राजीव अब तक घर नहीं लौटा था। उसके पिताजी का बहुत बड़ा कारोबार था। मैं अकेला बोर हो रहा था और शालिनी मेरे पास आकर बैठ गई वह कहने लगी कि आप मेरे कमरे में बैठ जाइए आप अकेले बोर हो रहे होंगे।

वहा पर आप मूवी देख लीजिए मैं उसके कमरे में चला गया और हम दोनों ही साथ में बैठकर मूवी देख रहे थे। वह मेरे बगल में बैठी थी तो मेरा हाथ उसकी जांघ पर पड़ गया हम दोनों ही पूरे मूड में आ गए। मैंने उसके होठों को जब अपने होठों में लिया तो मुझे बहुत अच्छा लगने लगा और मैं उसके होठों को बहुत देर तक चूसने लगा। मैंने काफी देर तक उसके होठों का रसपान किया वह उसके बाद जल्दी से उठी और उसने अपने दरवाजे को बंद कर दिया। जब उसने अपने कपड़े खोले तो उसने पिंक कलर की पैंटी ब्रा पहनी थी। उसकी गांड बहुत बड़ी थी मैंने उसे अपने पास बुलाते हुए उसके शरीर को चाटना शुरू कर दिया। मैंने उसकी योनि को चाटा तो उस पर एक भी बाल नहीं था मैंने काफी देर तक उसकी चूत का रसपान किया। मैंने जैसे ही उसकी योनि के अंदर अपने लंड को डाला तो उसके मुंह से तेज आवाज निकल आई और उसका खून भी उसकी योनि से बाहर निकलने लगा। मुझे बहुत अच्छा महसूस हो रहा था जब मैं उसे चोदे जा रहा था। मैंने उसे बड़ी तेजी से चोदना शुरू कर दिया जिससे कि वह बहुत सिसकिया लेने लगी मैं उसके चूचो को पकड़ लेता। मैंने उसे इतनी तेजी से धक्के मारे कि उसका पूरा शरीर हिलने लगा। मैं उसके स्तनों को अपने मुंह में लेने लगा लेकिन हम दोनों से एक दूसरे की गर्मी ज्यादा देर तक बर्दाश्त नहीं हो पाई। जब मेरा माल शालिनी की योनि में गिरा तो वह बहुत खुश हो गई। मैंने अपने लंड को उसकी योनि से निकालते हुए उसके मुंह में डाल दिया। वह बहुत अच्छे से मेरे लंड को चूसने लगी उसने काफी देर तक मेरे लंड को अपने मुंह में लेकर चूसा जिससे कि मुझे बहुत अच्छा महसूस होने लगा। उसका मन भर चुका था उसने मेरे लंड को अपने मुंह से बाहर निकाल लिया। हम दोनों ने अपने कपड़े पहन लिया राजीव भी कुछ देर बाद घर लौट चुका था।