मम्मी और बेटे के जिस्मानी रिश्ते

incest sex stories हैलो फ्रेंड्स, मेरा नाम देवराज है। मैं 6 फीट का सांवला लड़का हूँ।
मैंने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली है। यह बात तब की है.. जब मैं कॉलेज में था। मैं गुड़गाँव में किराए पर रहता था। यह अप्रैल की बात है। उस घर की मकान मालकिन और उसके बेटे के बीच का ये वाकिया मेरी आँखों देखा हाल कुछ इस तरह से है।

‘रवि..’ दिव्या अपने लंबे-लंबे काले बालों को चेहरे से हटाते हुए अपने बेटे के बेडरूम के दरवाजे की ओर गुस्साई नज़रों से देखती है।
‘रवि, मैं जानती हूँ.. तुम वहाँ पर इस समय क्या कर रहे हो। मुझे तुम्हारी ये रोज़ाना हस्तमैथुन करने की आदत से नफ़रत है.. रवि.. क्या तुम सुन रहे हो?’

नई नई जवानी में कदम रख रहे.. उसके बेटे ने कोई जवाब नहीं दिया। बिस्तर की पुश्त की दीवार से टकराने की लगातार आ रही आवाज़ और उँची हो जाती है और रवि और भी आतुरता से अपने लण्ड को पीटने लग जाता है। उसकी कलाई उसके मोटे.. लंबे और सख्त लण्ड पर ऊपर-नीचे और भी तेज़ी से फिसलने लग जाती हैं।

‘रवि..’ दिव्या ने तैश में आते हुए ज़ोर से अपने पाँव को फर्श पर पटका।
वो 36-37 बरस की यौवन से भरपूर मस्त नारी थी, बड़ी-बड़ी काली आँखें.. लंबे बाल.. छरहरा बदन.. पतली कमर और उस पर मोटे-मोटे गोल-मटोल मम्मे उसके जिस्म को चार चाँद लगाते थे।

‘रवि.. मेरी बात को अनसुना मत करो..’
रवि एक गहरी सांस लेता है.. और बिस्तर की पुश्त की दीवार से टकराने की आवाज़ और भी उँची हो जाती है। शायद वो स्खलन के करीब था।
दिव्या गुस्से से लाल होती हुई दरवाजे से पीछे की ओर हटते हुए नीचे हॉल की तरफ बढ़ जाती है। उसने एक टाइट जींस और नीले रंग की शर्ट पहनी हुई है.. जिसमें से उसके मोटे मम्मे बिना ब्रा के काफ़ी उछल-कूद मचा रहे होते हैं। यह किसी भी घरेलू गृहिणी के घर पर पहनने के लिए नॉर्मल पोशाक मानी जा सकती थी.. मगर वो जिस हालत में से गुज़र रही थी.. वो नॉर्मल नहीं थे।

एक तो वो तलाक़शुदा थी और उसकी नौकरी से उसे बहुत ज्यादा तनख्वाह नहीं मिलती थी। उसके बेटे की पढ़ाई का ख़र्च उसके पति द्वारा दिए गए खर्च से होता था और उसकी अपनी तनख्वाह से घर का खर्च अच्छे से चल जाता था।

कुल मिलाकर वो कोई रईसजादी नहीं थी.. लेकिन जीवन की सभी आवश्यक ज़रूरतें पूरी हो जाती थीं। उसकी खुशकिस्मती यह थी कि तलाक़ के बाद उसके पति ने घर को खुद उसके नाम कर दिया था और अपनी पहली बीवी के बेटे की पढ़ाई के खर्च की ज़िम्मेदारी भी अपने ऊपर ली थी.. ताकि तलाक़ आसानी से हो जाए। इन सब के ऊपर रवि की हस्तमैथुन की लत ने उसे परेशान किया हुआ था।

यह 6 महीने पहले शुरू हुआ था.. जब उसका नया नया तलाक़ हुआ था। रवि 18 बरस का बहुत ही सुंदर और मज़बूत कद काठी का मालिक था। उसकी जींस में हर समय रहने वाले उभार को दिव्या शरम के बावज़ूद भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती थी।

दिव्या ने कहीं पर पढ़ा था कि किशोर युवकों में संभोग की बहुत ही तेज़ और ज़ोरदार चाहत होती है। मगर अपने बेटे की पैन्ट में हर समय रहने वाला उभार उसके लिए अप्रत्याशित होता था।
उसे लगता था कि शायद उसकी सुंदर काया उसके बेटे के हस्तमैथुन का कारण है।
दिव्या की कमर ज़रूरत से कुछ ज्यादा ही पतली थी और उसकी लंबी टांगें और उसकी गोल-मटोल उभरी हुई गाण्ड.. उसके जिस्म को चार चाँद लगाते थे। उसके बड़े-बड़े मोटे-मोटे मम्मे ऐसे लगते थे.. जैसे वे कमीज़ फाड़ कर बाहर आना चाहते हों। जैसे वे पुकार-पुकार कर कह रहे हों.. आओ और हमें निचोड़ डालो। उसका जिस्म हर मर्द को अपनी और आकर्षित करता था और उसे इसी बात से डर था कि उसका अपना बेटा भी कोई अपवाद नहीं है।

तलाक़ के बाद पिछले 6 महीनों में उसने अपने बेटे को अक्सर उसके जिस्म का आँखों से चोरी-चोरी से मुआयना करते हुए पकड़ा था और उसकी पैंट में उस वक्त बनने वाले तंबू को देखकर वो अक्सर काँप जाया करती थी।

‘कम से कम उसे खुद को रोकने की कोशिश तो करनी चाहिए..’ दिव्या सोचती ‘या कम से कम उसे यह कम धीमे-धीमे बिना किसी आवाज़ के करना चाहिए..’

इस वक्त दोपहर के साढ़े तीन बज रहे थे और रवि को घर आए हुए अभी आधा घंटा ही हुआ था। वो घर आते ही भाग कर सीढ़ियाँ चढ़ कर सीधे ऊपर अपने कमरे में चला गया, उसकी पैंट में सामने का उभार साफ़ दिखाई दे रहा था।
दो मिनट बाद है ‘ठप.. ठप..’ की आवाज़ आनी शुरू हो गई।

वो यह आवाज़ रोज़ाना कम से कम चार बार सुनती थी, उसने कई बार इस बाबत रवि से बात करने की कोशिश की.. नर्मी से भी.. और सख्ती से भी.. लेकिन रवि कभी भी उसकी सुनता नहीं था। उसने जवाब में सिर्फ़ इतना ही कहा था- मैं चाह कर भी खुद को रोक नहीं पाता..
जैसे ही उसका लण्ड खड़ा होता था.. उसके हाथ खुद ब खुद उसे रगड़ने के लिए उठ जाते थे।

‘नहीं ऐसे नहीं चलेगा, उसे खुद पर संयम रखना सीखना होगा..’ दिव्या ने सहसा अपने ख़यालों से बाहर आते हुए खुद से कहा।

वो उठकर हॉल के क्लॉज़ेट में से रवि के कमरे की चाभी निकालती है। पक्के इरादे के साथ वो रवि के कमरे की ओर वापस बढ़ जाती है.. यह सोचते हुए कि आज वो अपने बेटे को रंगे हाथों पकड़ने जा रही है। किसी युवक के लिए इतना हस्तमैथुन ठीक नहीं था। रवि को अपनी शारीरिक़ इच्छाओं को काबू में रखना सीखना होगा।

दिव्या ने दरवाजा खोला और अन्दर दाखिल हो गई। रवि को एक लम्हे बाद एहसास हुआ कि उसकी मम्मी दरवाजा खोल कर अन्दर आ गई हैं। उसे ऐसी आशा नहीं थी.. वो हमेशा डोर लॉक करके ही हस्तमैथुन करता था.. लेकिन उसने कभी नहीं सोचा था कि उसकी मम्मी दूसरी चाभी से लॉक खोल सकती हैं।
जैसी दिव्या को आशंका थी.. वो पीठ के बल लेटा हुआ था और उसकी पैन्ट बिस्तर के पास नीचे पड़ी हुई थी।

बेबी आयल की एक बोतल बिस्तर के पास रखे स्टूल के ऊपर खुली पड़ी थी। रवि अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए अपनी कलाई को अपने लण्ड पर ऊपर-नीचे करते हुए और भी तेज़ी से चला रहा था।

दिव्या अपने बेटे के लण्ड को निगाह भर कर देखती है.. यह पहली बार था कि वो अपने बेटे के पूर्णरूप से विकसित खड़े लण्ड को उसके असली रूप में देख रही थी। उसकी कल्पना के अनुसार उसके बेटे के लण्ड का साइज़ छोटा होना चाहिए था यदि वो पूर्ण रूप से वयस्क था।
मगर उसने पहली नज़र में ही जान लिया कि उसकी कल्पना ग़लत थी। रवि का लण्ड बहुत बड़ा था। घुँघराली झांटों के बीच में खड़े उस मोटे सख्त लण्ड की लंबाई कम से कम 8.5 इंच थी और उसकी मोटाई उसकी कलाई के बराबर थी। लण्ड का सुपारा किसी छोटे सेब जितना मोटा था और गहरे लाल रंग की सुर्खी लिए हुए था.. उसके मुँह से रस बाहर आ रहा था।

उसी पल तलाक़शुदा सेक्स की प्यासी कुंठित माँ ने अपनी चूत में एक नई तड़प महसूस की।

उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि अपने बेटे का सख्त लण्ड देखकर उसकी चूत इतनी गीली और गरम हो जाएगी।

‘रवि.. मैं कहती हूँ.. तुम इसी पल रुक जाओ..’

रवि सर उठाता है.. और ऐसे दिखावा करता है.. जैसे उसे अपनी मम्मी के अन्दर आने का अभी पता चला हो। वो एक गहरी सांस लेता है और अपने लण्ड से हाथ हटाकर अपने सर के पीछे बाँध लेता है। वो अपने लण्ड को छुपाने की कोई कोशिश नहीं करता है। उसका विकराल लण्ड भयंकर तरीके से झटके मार रहा होता है।
दिव्या अपने बेटे के पास बिस्तर के किनारे बैठ जाती है और प्रयत्न करती है कि वो उसके लण्ड की ओर ना देखे। वो महसूस करती है कि उसके निप्पल खड़े हो रहे हैं और शर्ट के ऊपर से नज़र आ रहे हैं। वो मन ही मन सोचती है कि काश उसने ब्रा पहनी होती.. तो उसके चूचे उसके बेटे के सामने इस तरह झूला नहीं झूलते।

‘मॉम मुझे आपसे इस तरह की उम्मीद नहीं थी..’ रवि भुनभुनाते हुए बोलता है.. ‘क्या मुझे थोड़ी सी भी प्राइवेसी नहीं मिल सकती?’

‘तुम अच्छी तरह जानते हो.. मैंने कुछ समय पहले तुम्हारे दरवाजे पर दस्तक दी थी.. मेरे ख्याल से मेरे द्वारा चाभी इस्तेमाल करने के लिए इतना प्रमाण काफ़ी है.. तुम जानते हो यह ऐसा गंभीर मुद्दा है.. जिस पर हमें बात करने की सख्त ज़रूरत है। इन दिनों तुम सिर्फ़ हस्तमैथुन में ही व्यस्त रहते हो। यह सही नहीं है.. तुम कभी भी पढ़ाई नहीं कर सकोगे.. अगर तुम अपना सारा समय इस तरह हस्तमैथुन करते हुए बर्बाद करोगे..’

‘मैं खुद को विवश महसूस करता हूँ मॉम.. जैसे ही मेरा लण्ड खड़ा हो जाता है.. मेरे हाथ खुद भी खुद उसे रगड़ने के लिए उठ जाते हैं। आख़िर इसमें ग़लत क्या है?’ उसने बिना किसी शरम के ‘लण्ड’ शब्द का इस्तेमाल किया था। दिव्या उसकी बेशर्मी पर हैरान हो जाती है.. मगर अपने अन्दर एक अजीब सी सिहरन महसूस करती है।

‘क्या तुम अपने स्कूल में किसी हम उम्र लड़की को नहीं जानते.. जो तुम्हारे साथ..’
दिव्या यह कहते हुए खुद ही शरम से लाल हो गई.. यह सोचते हुए कि वो उसे किसी जवान लड़की को चोदने के लिए बोल रही है।
‘..ज..जो तुम्हें सामान्य ‘तरीके’ को समझाने में मदद कर सके..’

‘मम्मी तुम्हारा मतलब अगर किसी लड़की की चुदाई करने से है.. तो मॉम मैं ना जाने कितनी लड़कियों को चोद चुका हूँ.. लड़कियाँ मेरे इस मोटे लण्ड पर मरती हैं.. अगर तुम आज्ञा दो.. तो मैं कल एक लड़की लाकर यहीं पर चोद सकता हूँ। मुझे बस हस्तमैथुन करने में हद से ज्यादा मज़ा आता है.. इसलिए मैं खुद को रोक नहीं पाता हूँ।’

दिव्या ने महसूस कर लिया था कि उसका बेटा उसके सामने शरम नहीं करेगा, उसे खुद की स्थिति बहुत दयनीय लगी, एक तरफ़ तो उसे अपने बेटे से ऐसी खुली बातें करते हुए अत्यंत शर्म महसूस हो रही थी.. मगर उसका मातृधर्म उसे मजबूर कर रहा था कि उससे बातचीत करके कोई हल निकाले और दूसरी ओर उसे अपनी चूत में सुरसुराहट बढ़ती हुई महसूस हो रही थी।

‘तुम कम से कम अपनी पैन्ट तो वापिस पहन सकते हो.. जब तुम्हारी माँ तुमसे बात कर रही है.. तुम कितने बेशर्म हो गए हो..?’

‘मॉम, आप मुझसे बात करना चाहती थीं.. मैं अब और नहीं रुक सकता.. मेरे टट्टे वीर्य से भरे हुए हैं। मुझे अपना रस बाहर निकालना है।’

उसके बाद उस भारी भरकम लण्ड के मालिक उसके बेटे ने अपनी मम्मी को फिर से चौंका दिया.. जब उसने अपना हाथ लण्ड पर फेरते हुए उसे मजबूती से थाम लिया। आश्चर्य चकित दिव्या चाह कर भी खुद को अपने बेटे के विशाल लण्ड को घूरने से रोक ना सकी। जब रवि फिर से अपने लण्ड को धीमे मगर कठोरता से पीटने लग जाता है। रवि के मुँह से कराहने की आवाज़ें निकलने लगती हैं। जब उसकी कलाई उसके कुदरती तौर पर बड़े लण्ड पर ऊपर-नीचे होने लगती हैं।
‘रवि.. रवि.. भगवान के लिए..!’ तेज गुस्से और प्रबल कामुकता से अविभूत दिव्या अपने बेटे पर चकित रह जाती है।
‘तुम्हारी… तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई अपनी माँ के सामने ऐसा नीच कार्य करने की.. तुम अपने लण्ड से अपना हाथ इसी पल हटाओ वरना.. दिव्या गुस्से में सीधे ‘लण्ड’ शब्द का इस्तेमाल कर गई.. लेकिन उसकी हालत ऐसी थी कि उसे इसकी कोई परवाह नहीं थी।

‘मुझे इतना मज़ा आ रहा है मम्मी.. कि अब मुझसे अब रुका नहीं जाएगा..’
फिर रवि ने पूरी बेशर्मी से अपनी नज़रें अपनी मम्मी के मम्मों पर गड़ा दीं। उसके मुँह से ‘आह..’ निकलती है.. जब वो अपनी मम्मी के मोटे गुन्दाज मम्मों को उसकी शर्ट के नीचे हिलाते हुए देखता है।
‘माँ.. वाकयी में तुम्हारे तो बहुत ‘बड़े’ हैं मम्मी.. कभी-कभी मैं मुट्ठ मारते हुए उन्हें चूसने के बारे में सोचता हूँ.. मगर मुट्ठ मारते हुए उन्हें अपनी आँखों के सामने देखना कहीं ज्यादा बेहतर है..’

‘रवि..!’ दिव्या अपने बेटे की बातों से इतना स्तब्ध रह जाती है कि मुँह नीचे कर लेती है कि उसे अपने बेटे को इसी पल उसका लण्ड रगड़ने से रोकना है। वो अपना हाथ नीचे उसके लण्ड की ओर बढ़ाती है.. इस इरादे के साथ.. कि वो उसकी उंगलियों को खींच कर उसके लण्ड से अलग कर देगी।

मगर उसी समय रवि.. जिसने देख लिया था कि उसकी मम्मी का इरादा क्या है.. वो चालाकी से अपने हाथ को एकदम से हटा देता है और अगले ही पल दिव्या को महसूस होता है कि उसके हाथ में उसके बेटे का विकराल लण्ड समा चुका है।

‘ओह मम्मी.. तुम्हारे हाथ का स्पर्श कितना मजेदार है.. तुम अपने हाथ से इसे क्यों नहीं रगड़तीं..!

‘बदतमीज़.. बेशरम..!’

फिर दिव्या वाकयी में अपने बेटे की इच्छा अनुसार उसके लण्ड को सहलाने लग जाती है। उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि उसे क्या हो गया है.. क्यों वो अपने बेटे के साथ दुनिया का शायद सबसे बड़ा गुनाह करने को इतना उत्सुक थी.. अत्यधिक कामोत्तेजना में उसकी फुद्दी कामरस से भीग कर उसकी पैन्टी में कांप रही थी। वो खुद को गुस्से, निराशा और एक अनियंत्रित कामुकता से अविभूत महसूस कर रही थी।

अपनी काम-लोलुप मम्मी के हैण्ड-जॉब के आगे पूरी तरह समर्पण कर.. रवि वहाँ पर लेटे हुए मुस्करा रहा था। दिव्या अब अपने बेटे के विशाल लण्ड को खुल्लमखुल्ला निहार रही थी और मुँह बनाकर अपना हाथ उसके विकराल लण्ड पर जितनी तेज़ी से कर सकती थी.. ऊपर-नीचे कर रही थी।

‘क्या तुम्हें ये अच्छा लग रहा है.. रवि.. क्या तुम यही चाहते थे कि मैं तुम्हारे साथ ऐसा करूँ? तुम्हारी अपनी माँ? क्या तुम सचमुच में इतने नीचे गिर चुके हो.. इतने बेशरम हो गए हो? तुम यही चाहते हो कि में. तुम्हारी मम्मी तुम्हारे इस मोटे लंबे लण्ड को अपने हाथों में लेकर मुट्ठ मारे?’

रवि बस ‘आह्ह..’ भर कर रह गया।

‘क्या तुम मम्मी को अपना लण्ड भी चुसवाना चाहते हो? तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा.. है ना? तुम्हें कितना मज़ा आएगा.. अगर तुम्हारी अपनी मम्मी तुम्हारे लण्ड को मुँह में लेकर चूसे और तुम्हारा सारा रस पी जाए..’

रवि जवाब में उसका हाथ अपने लण्ड से हटा देता है.. झूलते हुए उठता है और बिस्तर के किनारे पर बैठ जाता है। वो अपनी मम्मी की ओर देखते हुए दाँत निकालता है और फिर घमंड से अपने तगड़े लण्ड की ओर इशारा करता है।
‘हाँ.. यही तो मैं चाहता था.. हमेशा से.. मम्मी तुम घुटनों के बल बैठ जाओ.. मेरे लण्ड को इस समय एक जोरदार चुसाई की ज़रूरत है..’
‘रवि तुम एक बहुत ही गंदे बेशरम लड़के हो..’

और फिर दिव्या के मुँह से अल्फ़ाज़ निकलने बंद हो गए.. वो वही करने जा रही थी.. जैसा उसके बेटे ने अनुरोध किया था।
रवि के सामने घुटनों पर होते हुए उसने उस विशाल और खड़े लण्ड को अपनी आँखों के सामने पाया।

दिव्या ने महसूस किया कि वो बहुत गहरी साँसें ले रही है.. वो अपनी दिल की धड़कनों को अपनी छाती से कहीं ज्यादा अपनी चूत में महसूस कर रही थी। उसे ऐसा लग रहा था जैसे वो सारा नियन्त्रण खो बैठी हो.. जिससे अब उसके लिए इस बात में अंतर करना नामुमकिन था कि वो क्या कर रही थी और क्या करने का सोच कर वहाँ आई थी।

उसे खुद पर विश्वास नहीं हो रहा था कि वो अपने बेटे के लण्ड को अपने मुँह में डाल कर उसका उगलने वाले रस को पीने जा रही है। दिव्या अपनी उंगलियाँ उस फड़फड़ा रहे लण्ड के गिर्द कठोरता से कसते हुए अपनी कलाई उसकी जड़ तक ले गई। वो कुछ पलों के लिए गुलाबी रंगत लिए उस फूले हुए सुपारे की ओर देखती है कि कैसे वो मोटा मुकुट.. चिपचिपे रस से चमक रहा है।
उसकी आँखों में एक इरादे की झलक थी।
फिर वो चंचल और अनियंत्रित माँ अपना सिर को नीचे की ओर लाती है और अपने होंठ उसके सुपारे से सटा देती है। बेशरमी से वो अपनी जिव्हा बाहर निकालते हुए सिहरन से कांप रहे लण्ड के सुपारे से टपकते हुए गाढ़े रस को चाट लेती है।

‘आहह.. मम्मी मैं तुम्हें बता नहीं सकता मुझे कैसा महसूस हो रहा है.. मैंने सोचा भी नहीं था कि इसमें इतना मज़ा आएगा..’ रवि अपनी मम्मी के सिर को दोनों हाथों से थामे हुए कांप सा रहा था।

‘इसे अपने मुँह में अन्दर तक डालो मम्मी.. चूसो इसे.. हाय मम्मी.. अच्छे से और ज़ोर से चूसो..’

दिव्या ने अपनी आँखें बंद कर लीं.. वो अपने दिमाग़ में गूँज रही उस आवाज़ को बंद कर देना चाहती थी.. जो उसे बता रही थी कि वो अब ऐसी माँ बन गई है.. जो अपने ही बेटे का लण्ड मुँह में लेकर चूसती है।
धीरे-धीरे उसके होंठ अपने बेटे के लण्ड की कोमल त्वचा पर फिसलने लगे।

एक-एक इंच कर सुड़कते हुए वो उस विशालकाय धड़कते लण्ड को मुँह में भरती जा रही थी। जब एक तिहाई लण्ड उस कामुक माँ के मुँह में समा जाता है तो वो गहरी साँस लेते हुए रुक जाती है। अगर वो इससे ज्यादा लण्ड को अपने मुँह में लेने की कोशिश करती.. तो उसका गला रुक जाता या उसकी साँस ही बंद हो जाती।

उसके बाद कामोत्तेजित माँ अपने बेटे के लण्ड को अत्यधिक कड़ाई से चूसना चालू कर देती है.. आँखें बंद रखते हुए वो संतुष्टिपूर्वक उसके अकड़े हुए लण्ड को चूसती है। वो अपने दिमाग़ में एक बेतुके.. निरर्थक विचार से उस गुनाह को न्यायसंगत.. और उचित ठहरा रही थी। जो अपने सगे बेटे के साथ वो कर रही थी.. इस विचार के तहत कि वो अपने बेटे के सामने साबित कर रही थी कि उसे कितना घिनौना और बुरा महसूस होगा.. अगर वो अपनी ही मम्मी को अपना लण्ड चुसवाएगा।

दिव्या ने ज़ोर लगाते हुए.. पूरा ज़ोर लगाते हुए उस लण्ड को चूसा। उसे इस बात से झटका लगता है कि वो कितनी तत्परता से अपने ही बेटे के लण्ड सुड़कते हुए चूस रही थी। वो अपने मुँह को बलपूर्वक उस लण्ड की जड़ तक पहुँचने की कोशिश करती है।

बुरी तरह से खाँसते हुए वो पूर्ण आत्मबल से पूरे लण्ड को एक ही बार में निगलने की कोशिश करती है। इतनी देर से चल रही उस कठोर और गीली चुसाई का असर उस लण्ड पर अब दिखाई दे रहा था। वो बढ़ते हुए और भी बड़ा और कठोर हो गया था। बेटे के लण्ड का सुपारा अश्लीलतापूर्वक घमंड से अपनी मम्मी के गले की गहराई में चोट मार रहा था।

‘उमल्ल्ल अप्प्प..’ दिव्या के मुँह से निकलने वाली संतुष्टिपूर्वक लण्ड चुसाई की आती कामुक और सुड़कने की आवाज़ें बहुत ज्यादा उँची हो चुकी थीं और पूरे बेडरूम में गूँज रही थीं। उत्तेजनापूर्वक अपने सिर को ऊपर-नीचे करते हुए वो अपने बेटे के विकराल लण्ड को अपने मुँह से आगे-पीछे चोदना चालू कर देती है।

उसकी उंगलियाँ उसके लण्ड की जड़ पर कस जाती हैं। फिर वो प्रगाड़ता के साथ सुपारा चूसते हुए लण्ड को मुठियाने लग जाती है। कुकरमुत्ते जैसे सुपारे पर उसकी जिव्हा गोल-गोल घूमते हुए उसे थूक से चिपड़ते हुए नमकीन रस को चाटती है.. जो उस विशाल अकड़े लण्ड से टपक रहा होता है।

‘मम्मी.. आह्ह.. मैं जल्द ही.. आहह.. झड़ने वाला हूँ..’ रवि करहता हैं उंगग्घ.. मम्मी.. मुझे एहसास हो रहा है.. मेरे टट्टे भारी माल से पूरी तरह भर गए हैं.. आह्ह.. और चूसो इसे.. मेरे लण्ड को ज़ोर से चूसो मम्मी.. तुम वाकयी में ग़ज़ब का लण्ड चूसती हो..’
बेटे की वो शर्मनाक.. घृणित टिप्पणी सुन कर दिव्या के कानों में रस सा घुल जाता है। उसकी चेहरा लाल हो जाता है और वो जितनी कठोरता से उस लण्ड को चूस सकती थी.. चूसना चालू कर देती है।

कामरस से भरे उस लण्ड के उसके मुँह में होने के कारण उसके गाल शीघ्रता से फैलते और सिकुड़ते हैं। वो बेताब थी एक बहुत भारी फुव्वारे के फूटने के लिए। उसके मन में एक नई इच्छा ने जन्म ले लिया था कि उसका बेटा उसे उसका पूरा वीर्य निगलने के लिए बाध्य कर दे।

‘आह्ह.. पी जाओ इसे मम्मी.. मैं आ रहा हूँ.. आहह आ रहा हूँ.. आअहहह..’

वो उचक कर उसका सिर पकड़ लेता है और धक्का मारकर चोदते हुए अपने लण्ड को एक इंच और उसके होंठों के अन्दर पहुँचा देता है। धक्के के कारण वो बिस्तर से नीचे उतर जाता है। दिव्या की साँस रुक जाती है.. मगर आख़िरकार उसकी इतनी जबरदस्त.. कामुक लण्ड चुसाई की मेहनत का फल उसे मिला था।

लण्ड के सूजे हुए सुपारे से वीर्य की एक तेज पिचकारी फूटती है.. जो उस कामरस की प्यासी उस माँ के गले की गहराई में थरथराहट से चोट करती है।

‘उम्म्म अल्ल्लप्प्प्प.. गुडुप.. पप..’ दिव्या के मुँह से ‘गलाल.. गलाल..’ की आवाज़ आती है।

लण्ड उसके मुँह में रस उगलने लगता है। उसके गले में रस की तेज़-तेज़ धाराएँ फूटती हैं.. जो गले में अन्दर की ओर बहने लगती हैं। उत्तेजनावश वो उस विशाल गाढ़े रस फेंक रहे लौड़े से चिपक जाती है। उसे अपने नवयुवक बेटे के वीर्य का स्वाद अत्यधिक स्वादिष्ट लगता है।

कामोत्तेजित माँ पूरी बेशरमी से लण्ड को चूसने का.. उसे मुठियाने का.. और उसका रस पीने का.. तीनों काम एक साथ शुरू कर देती है। वो अपने बच्चे के लण्ड को तब तक छोड़ना नहीं चाहती थी जब तक कि वो उससे निकलने वाले नमकीन रस की आख़िरी बूँद तक ना पी जाए।

कुछ देर बाद वीर्य का विस्फोट रुक जाता है और पतली सी कमर की उस अत्यधिक सुंदर माँ को अपना पेट लण्ड-रस से पूरा भरा हुआ महसूस होता है.. जिसकी उसने मन ही मन में लालसा पाल रखी थी।
वो अपने सिर को अपने बेटे के लण्ड से ऊपर उठाती है। स्तब्ध और अपरचित उत्तेजना में वो अपनी जिव्हा को अपने मुँह के चारों ओर घुमा कर बाकी की क्रीम भी चाट लेती है।
दिव्या की साँसें बहुत भारी हो गई थीं और उसकी चूत तो इतनी गीली हो उठी थी कि उसकी कच्छी सामने से पूरी तरह गीली हो गई थी।

रवि का लण्ड अभी भी बहुत सख्ती से खड़ा हुआ था और उसकी मम्मी के मुँह के आगे फड़फड़ा रहा था। दिव्या ने जब कल्पना की कि उसके बेटे का विकराल.. मोटा.. चूत खुश कर देने वाला लण्ड.. उसकी चूत में गहराई तक घुस कर.. अन्दर-बाहर होते हुए.. कैसे उसकी चूत की चुदाई करेगा.. तो उसने अपनी चूत में एक मस्त ऐंठन महसूस की।

‘वेल.. मुझे उम्मीद है बेटा कि अब तुम पूरी तरह से संतुष्ट हो गए होगे..?’ दिव्या हाँफते हुए बोलती है।
‘तुम वास्तव में मम्मी से अपना विशाल लण्ड चुसवाने में कामयाब हो गए.. मेरा अनुमान है.. अब तुम अपनी मम्मी के साथ और गंदे काम करने के तमन्ना भी रखते होगे..’

रवि दाँत निकालते हुए ‘हाँ’ में सिर हिलाता है।
दिव्या अपने पाँव पर खड़ी होती है.. उसके हाथ अपनी शर्ट के बटनों को बेढंग तरीके से टटोलते हैं.. क्यों उसकी आँखें तो अपने बेटे के विशालकाय लण्ड पर जमी हुई थीं। वो चाह कर भी उससे नज़रें नहीं हटा पा रही थी।
‘तो फिर मेरे ख्याल से अच्छा होगा कि अगर तुम अपने बाकी के कपड़े भी उतार दो। रवि अब जब हमने शुरूआत कर ही ली है.. तो यही अच्छा होगा कि तुम्हारे दिमाग़ से ये घृणित हसरतें हमेशा हमेशा के लिए निकाल दी जाएँ।’

रवि बेशर्मी से हँसता है और अपने जूते उतार कर.. अपनी पैंट भी उतार देता है.. जो उसके घुटनों में इतनी देर से फंसी हुई थी। अब उसके जिस्म पर केवल एक कमीज़ बची थी। उसकी नज़र में मम्मी की जोरदार ठुकाई करने के लिए उसे अपनी कमीज़ उतारने की कोई ज़रूरत नहीं थी। ऐसी ठुकाई.. जिसकी शायद उसकी मम्मी तलबगार थी। वो नीचे फर्श पर बैठ जाता है और अपनी मम्मी को कपड़े उतारते हुए देखता है।

दिव्या के गाल शरम से लाल हो जाते हैं जब वो अपनी कमीज़ उतार कर अपने उन मोटे-मोटे गोल-मटोल मम्मों को नंगा कर देती है। वो चूचे.. जिन पर उसे हमेशा गुमान था और हो भी क्यों ना.. इस उम्र में भी उसके चूचे किसी नवयुवती की तरह पूरे कसावट लिए हुए थे..। उसके पूरी तरह तने हुए चूचे.. जो बाहर से जितने मुलायम और कोमल महसूस होते थे.. दबाकर मसलने पर उताने ही कठोर लगते थे।

दूधिया रंगत लिए हुए चूचे कश्मीर की चोटियों के समान जन्नत थे.. उस पर सजे हुए गहरे लाल रंग के चूचुक.. जो इस वक्त तन कर पूरी तरह से उभरे हुए थे। मम्मी की पतली और नाज़ुक कमर के ऊपर झूलते हुए वो विशालकाय चूचे.. किसी अखंड ब्रह्मचारी का ब्रह्मचर्य भी भंग करने के लिए काफ़ी थे।

‘तुम्हारे चेहरे के हावभाव को देखकर लगता है.. तुम्हें अपनी मम्मी के ये मोटे चूचे बहुत भा गए हैं। रवि मैं सच कह रही हूँ ना..? दिव्या बेशरमी से अपने बेटे को छेड़ती है।
उसके हाथ अपनी पतली कमर पर थिरकते हुए ऊपर की ओर बढ़ते हैं और वो अपने विशाल.. गद्देदार चूचों को हाथों में क़ैद करते हुए उन्हें कामुकतापूर्वक दबाती है। दिव्या अपने पाँव को हिलाते हुए अपनी उँची एड़ी की सेंडिलों को निकाल देती है।
फिर उसकी जींस का नंबर आता है.. काम-लोलुप मम्मी अपने काँपते हाथों से जींस का बटन खोलती है और फिर उसे भी अपने जिस्म से अलग कर देती है।
एक काले रंग की कच्छी के अलावा पूरी नग्न माँ अपने बेटे के पास बिस्तर पर बैठ जाती है।

‘रवि आगे बढ़ो.. अब तुम अपनी मम्मी के मम्मों को चूस सकते हो.. मेरा अनुमान है.. तुम मुट्ठ मारते हुए इन्हें चूसने की कल्पना ज़रूर करते होगे..’
अपनी मम्मी की बात के जवाब में रवि सहमति के अंदाज़ में सिर हिलता है. फिर वो अपनी मम्मी के सामने घुटनों के बल होते हुए उसके विशाल और कड़े चूचे को हाथों में भर लेता है.. चूचुकों पर अंगूठे रगड़ते हुए वो किसी भूखे की तरह उन जबरदस्त चूचों को निचोड़ने और दबाने लग जाता है। चूचों के मसलवाने का आनन्द सीधा दिव्या की चूत पर असर करता है और उसके जिस्म में एक कंपकपी सी दौड़ जाती है।

‘तु..तुम चाहो तो इनको चूस भी सकते हो.. अगर तुम्हारा मन करता है तो..’ दिव्या काँपते हुए लहज़े में बोलती है।

रवि अपनी मम्मी के जिस्म पर पसरते हुए मुँह खोल कर एक तने हुए चुचक को अपने होंठों में भर लेता है। कामुकतापूर्वक वो अपने गालों को सिकोड़ता हुआ अपनी मम्मी के विशाल चूचों को ‘सुडॅक.. सुडॅक..’ कर चूसता है.. ठीक उसी तरह जैसे कभी वो बचपन में अपनी मम्मी का दूध पीते हुए करता था।

दिव्या ‘आह.. आह..’ करती है.. उसकी चूत की प्यास हर बीतते पल के साथ बढ़ती ही जा रही थी। वो अपने प्यारे बेटे के सिर को कोमलता से सहलाते हुए उसे अपने मम्मे चूसने के लिए उकसाती है.. जो उसके बेटे को पसंद भी था।
‘तु..तुम.. अब मेरी चूत को भी चूस सकते हो..’ दिव्या फुसफुसते हुए बोलती है।
‘मेरा ख्याल है.. तुम वो भी ज़रूर करना चाहते हो..’

रवि अपना हाथ नीचे सरकाता हुआ अपनी मम्मी की जाँघों के दरम्यान ले जाता है और अपनी उंगली उसकी चूत पर कच्छी के ऊपर से दबाता है। वो अचानक मम्मों को चूसना बंद कर देता है। चेहरे पर विजयी भाव लिए हुए वो उसकी आँखों में झांकता है।
‘हाय मम्मी.. तुम्हारी चूत तो एकदम रसीली हो गई है..’

दिव्या शर्मा जाती है.. वो यह तो जानती थी कि उसकी फुद्दी गीली है.. मगर यह नहीं जानती थी कि इतनी गीली है कि उसकी जाँघें भीतर से.. उसकी चूत से रिसने वाले पानी के कारण पूरी तरह चिकनी हो गई थीं और सामने से कच्छी उसकी गीली चूत से बुरी तरह से चिपकी हुई थी।
उसका बेटा कच्छी को पकड़ता है और उसे खींच कर उसके जिस्म से अलग कर देता है। अब उसकी मम्मी उसके सामने पूरी तरह से नंगी पड़ी थी। रवि माँ की जाँघों को फैलाते हुए उसकी गीली और फड़फड़ा रही स्पंदनशील चूत को निहारता है।
रवि प्रत्यक्ष रूप से अपनी माँ की मलाईदर चूत देखकर मंत्रमुगध हो जाता है।

‘बेटा तुम मेरी और इस तरह किस लिए देख रहे हो..?’ दिव्या हाँफती हुए बोलती है।
‘तुम अपने इस मूसल लण्ड को सीधे मेरी चूत में क्यों नहीं घुसा देते..? मैं जानती हूँ.. तुम्हारे मन की यही लालसा है.. भले ही मैं तुम्हारी माँ हूँ..’

‘नहीं.. मॉम.. मैं पहले इसे चाटना चाहता हूँ..’ रवि बुदबुदाता है।
रवि अपनी मम्मी की लंबी टांगों के बीच में पसरते हुए उसकी जाँघों को ऊपर उठाता है.. ताकि उसका मुँह माँ की फूली हुई गीली और धधकती हुई चूत तक आसानी से पहुँच जाए।

दिव्या को एक मिनट के बाद जाकर कहीं समझ में आता है कि उसका अपना बेटा उसकी चूत चूसना चाहता है और जब उसके बेटे की जिह्वा कामरस से लबालब भरी हुई उसकी चूत की संगठित परतों पर पहला दबाव देती है.. तो उसका जिस्म थर्रा उठता है, उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं और वो मदहोशी में अपने होंठ काटती है।
‘उंगघ.. हाय… रवि.. तु..तुम ये क्या कर रहे हो बेटा.. उंगघ.. उंगघ.. म्म्म्म म..’

मगर रवि चूत चूसने में इतना मस्त था कि उसने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। स्पष्ट था कि उसे अपनी मम्मी की चूत का ज़ायक़ा बहुत स्वादिष्ट लगा था।

अपनी जिह्वा को रस से चमक रही गुलाबी चूत में ऊपर-नीचे करने में उसे बड़ा मज़ा आ रहा था। दिव्या ने तुरंत ही अपने मन में एक डर सा महसूस किया कि पता नहीं वो अपने बेटे के सामने अब कैसे बर्ताव करेगी। वो अपने बेटे द्वारा चूत चूसे जाने से पहले ही बहुत ज्यादा कामोत्तेजित थी।

जब उसके बेटे ने अपनी जिह्वा के इस्तेमाल से ही उसकी कुलबुला रही चूत को और भी गीला कर दिया था.. उसकी खुजली में और भी इज़ाफ़ा कर दिया था.. तो आगे चलकर उसकी क्या हालत होगी.. उसे यह बात सोचते हुए भी डर लग रहा था कि कहीं हूँ मदहोशी में अपनी सुधबुध ना खो बैठूं और बेटे के सामने एक रंडी की तरह बर्ताव ना करने लग जाऊँ।

‘नहीं.. बेटा.. तुम्हें हहम्म.. तुम्हें मम्मी की चूत चूसने की कोई ज़रूरत नहीं है.. उंगघ.. बस अपनी मम्मी को चोद डालो.. बेटा.. मैं जानती हूँ.. तुम भी सिर्फ़ यही चाहते हो..’

रवि कोई जवाब नहीं देता है.. उसकी उंगलियाँ चूत के होंठों को फैलाए रखती हैं ताकि वो अपनी जिह्वा अपनी माँ के गीले और सुगन्धित छेद में पूरी गहराई तक डाल सके। चूत की गहराई से बह रहे मलाईदार रस का बहना लगातार जारी था और चूत का दाना सूज़ कर और भी मोटा हो गया था.. जो रोंयेदार चूत की लकीर के ऊपर उभरा हुआ साफ़ दिखाई दे रहा था।

रवि अपनी जिह्वा को चूत के ऊपर की ओर घुमाता है। वो चूत चूसने के कौशल में अपनी प्रवीणता उस समय साबित कर देता है.. जब वो अपनी जीभ अपनी मम्मी की चूत के दाने पर एक तरफ़ से दूरी तरफ तक कोमलता से रगड़ता है। निर्वस्त्र माँ सीत्कार करते हुए बेटे के सिर को दोनों हाथों में थाम लेती है और फिर वो अविलंब अपने नितंब बिस्तर से ऊपर हवा में उछालते हुए शीघ्रता से आती.. अपने बेटे का मुँह अपनी गीली फुद्दी से चोदने लगती है।
दिव्या भर्राए गले से बोलती है ‘हाय.. बेटा.. उंगघ.. मम्मी को चूसो बेटा.. मम्मी को बुरी तरह से चूस डालो.. उंगघ.. मम्मी के दाने को चाट.. चूसो इसे.. अच्छे से चूसो.. ओह्ह.. अपनी मम्मी को झड़ा दो मेरे लाल.. मेरा पूरा पानी निकाल डालो.. और पी जाओ.. हाअई एयई..’

रवि चूत को चूमते हुए उसकी चुसाई चालू रखता है। केवल तभी विराम लगाता है.. जब वो अपना चेहरा मम्मी की घनी.. सुनहरी रंग की घुँघराली झांटों पर रगड़ता है। अब वो अपनी उंगलियाँ सीधी करता है और उन्हें अपनी माँ की चूत के संकीर्ण और बुरी तरह से चिपके हुए होंठों के अन्दर तक डालता है।

उस वक्त दिव्या के जिस्म में कंपकंपी दौड़ जाती है.. जब उसका बेटा उसकी चूत में उंगली करते हुए उसके दाने को मुँह में भरकर चूसता है।
‘ह..हहाय..रवि.. चूस इसे.. हहाँ..मैं तेरी मिन्नत करती हूँ बेटा..’

रवि दाने को होंठों में दबाए हुए उसे कोमलता से चूसता है.. मगर जिह्वा को उस पर कठोरता से रगड़ते हुए और साथ ही साथ शीघ्रता से उसकी फुद्दी में अपनी उंगलियाँ अन्दर तक डालता है।
दिव्या अपने भीतर गहराई में रस उमड़ता हुआ महसूस करती है.. जिसके कारण उसके चूचुकों और गुदाद्वार में सिहरन सी दौड़ जाती है और स्खलनपूर्व होने वाले मीठे अहसास से उसके जिस्म में आनन्द की खलबली मच जाती है। फिर वो जिस्म को अकड़ाते हुए अनियंत्रित ढंग से स्खलित होने लगती है.. जब उसका अपना बेटा उसकी चूत को चूस रहा होता है।

‘चूस इसे बेटा ज़ोर से चूस.. उंगघ.. चाट इसको.. अपनी मम्मी की चूत चाट.. मैं झड़ रही हूँ बेटा.. हाँ.. मैं झड़ रही हूँ.. आअहह..’

दिव्या की तड़पती चूत संकुचित होते हुए इतना रस उगलती है कि उसका लाड़ला दिल खोल कर चूत-रस को चूस और चाट सकता था। रवि मम्मी के दाने को लगातार चूसते हुए और उसकी चूत में उंगली करते हुए उसे स्खलन के शिखर तक ले जाता है। लगभग एक मिनट बीत जाने पर चूत का संकुचित होना कम होता है।

तब तक दिव्या को अपनी फुद्दी के भीतर गहराई में एक ऐसी तड़पा देने वाली कमी महसूस होने लग जाती है.. जैसी उसने आज तक महसूस नहीं की थी। वो चाहती थी कि उसका बेटा जितना जल्दी हो सके उसकी चूत में अपना मूसल जैसा लण्ड घुसेड़ दे। वो अपने बेटे के मोटे मांसल लण्ड से अपनी चूत ठुकवाने के लिए मरी जा रही थी।
‘तु…तुम.. अब अपनी मम्मी को चोद सकते हो बेटा.. मैं जानती हूँ… असलियत में तुम यही चाहते हो.. है ना..? आगे बढ़ो बेटा.. इसे मेरी चूत में घुसेड़ डालो.. जल्दी बेटा जल्दी.. आह्ह..’

रवि अपनी मम्मी की जाँघों के बीच अपने लण्ड को रगड़ते हुए उसके ऊपर चढ़ जाता है। उसका विकराल लण्ड रस टपकाते हुए उसके पेट पर ठोकर मार रहा था। दिव्या अधीरता पूर्वक अपना हाथ नीचे लाती है और अपने बेटे के लण्ड को पकड़ कर उसके सुपारे को अपनी चूत के द्वार से लगा देती है।

दिव्या अपना निचला होंठ दांतों में दबाए हुए रिरियाती है.. जब उसे अपने बेटे का लण्ड उसकी चूत को भेदते हुए अन्दर दाखिल होता महसूस होता है। उसकी चूत के मोटे होंठ बेटे के आक्रमणकारी लण्ड की मोटाई के कारण बुरी तरह से फैल कर उसको कसकर जकड़ लेते हैं। दिव्या को ऐसा महसूस हो रहा था.. जैसे कोई मोटी लोहे की गरम-गरम रॉड उसकी चूत में जाकर फँस गई हो।

‘उबगघ.. हहाय.. रवि तेरा वाकयी में बहुत बड़ा है.. तुम इसे वाकयी में मेरे अन्दर ठूँसने जा रहे हो.. है ना..? उंगघ.. आगे बढ़ो मेरे लाल.. और ठूंस दो इसे अपनी मम्मी की चूत में.. जल्दी से.. जल्दी..’

रवि अपनी जांघें चौड़ा लेता है.. ताकि उसके कूल्हे चूत में लण्ड ठोकने के लिए सबसे बढ़िया स्थिति में हों। फिर वो अपने लण्ड को धीरे-धीरे आगे-पीछे करते हुए धक्के लगाना चालू कर देता है। हर धक्के के साथ वो अपना लण्ड अपनी माँ की चूत में गहरा और गहरा करता जाता है, लण्ड उसकी मम्मी की चूत की दीवारों से चिपकते हुए आगे बढ़ने लग जाता है।

दिव्या अपना सिर ऊपर उठाते हुए नीचे की ओर देखती है कि कैसे उसके बेटे का खौफनाक लण्ड जिस पर नसें उभर आई थीं.. उसकी संकरी चूत में आगे-पीछे हो रहा था।
चूत लण्ड के मिलन का यह नज़ारा देखने में बड़ा ख़तनाक.. मगर साथ ही साथ बेहद रोमांचित कर देने वाला भी था। दिव्या अपने कूल्हे हवा में उछालते हुए अपनी तड़पती चूत अपने बेटे के मोटे लण्ड पर दबाव देती है ताक़ि उसके बेटे का पूरा का पूरा मोटा लण्ड चूत की जड़ तक पहुँच सके।

‘रवि त..तुम मुझे गहराई तक चोद सकते हो..’ वो हाँफते हुए बोलती है, ‘आगे बढ़ो बेटा.. और अपनी मम्मी की चूत जितना गहराई तक हो सके.. चोदो.. आह्ह..’

रवि और भी कठोरता से धक्के लगाना चालू कर देता है। वो वाकयी में अपना विशाल लण्ड माँ की संकरी.. काँपती चूत में इतने बलपूर्वक ठोकता है कि अपने बेट के हर धक्के पर दिव्या का जिस्म कांप उठता है।
आख़िरकार वो अपना पूरा लण्ड अपनी मम्मी की चूत में डालने में सफल हो जाता है। दिव्या ने पूरी जिंदगी में.. खुद को किसी कठोर लण्ड द्वारा इतना भरा हुआ कभी महसूस नहीं किया था। उसे ऐसा महसूस हो रहा था.. जैसे उसकी चूत को पूरा का पूरा भर दिया गया हो।

उसकी चूत बुरी तरह ऐंठने लगती है और उस विशाल लण्ड को, जो उसकी बच्चे-दानी पर ठोकर मार रहा था.. को चारों और से भींचते हुए मम्मी की चूत में अपना पूरा लण्ड ठोक कर रवि अपना तगड़ा लण्ड मम्मी की चूत में डाले हुए कुछ पलों के लिए स्थिर हो जाता है। वो अपनी कोहनियों को मोड़कर अपने जिस्म सहित अपनी माँ के ऊपर पसर जाता है, दिव्या के मोटे-मोटे चूचे अपने बेटे की छाती के नीचे दब जाते हैं।

‘चोद अपनी माँ को.. रवि.. माँ की चूत फाड़ दे.. मादरचोद..’

अनैतिक व्याभिचार की उसकी कामना और भी प्रबलता से स्पष्ट हो जाती है। दिव्या अपनी टांगें ऊपर की ओर जितना उठा सकती है.. उठाती है और फिर अपने पैर अपने बेटे की पीठ पर कैंची की तरह लगा कर बाँध लेती है। फिर वो व्यग्रता से अपने कूल्हे हिलाते हुए अपनी गीली और कसी चूत से अपने बेटे के लण्ड को किसी कामोत्तेजित रंडी की तरह चोदने लग जाता है।

‘मैंने कहा चोद मुझे.. मम्मी अब बहुत चुदासी है बेटा.. मुझे अब बस चोद डाल.. फाड़ दे मेरी.. मेरी चूत में अपना घोड़े जैसा लण्ड घुसा डाल्ल.. फाड़ डाल.. अपनी माँ की चूत.. अपने गधे जैसे लण्ड से..’

रवि लण्ड बाहर निकालता है.. तब तक बाहर खींचता है.. जब तक सिर्फ़ लण्ड का गीला और फूला हुआ सुपारा उसकी माँ की फुद्दी के होंठों के बीच रह जाता है.. वो पूरे ज़ोर से अपने कूल्हे नीचे की और लाते हुए एक जोरदार धक्का मारता है और उसका विकराल लण्ड उसकी माँ की चूत में जड़ तक घुस जाता है। अपनी माँ की चूत में लगाया यह पहला घस्सा उसे इतना मजा देता है कि उसका पूरा जिस्म काँप जाता है।

तब तक दिव्या किसी बरसों की प्यासी, अतिकामुक औरत की तरह अपने कूल्हे उछालते हुए चुदती रहती है। जब वो अपनी चूत अपने बेटे के लण्ड पर मारती है.. तो उसके मोटे चूचे कंपन करते हुए बुरी तरह से उछलते हैं। रवि अपनी मम्मी की ताल से ताल मिलाते हुए अपना मोटा हल्लबी लण्ड उसकी मखमली चिकनी चूत में पूरी गहराई तक पेल डालता है।

‘ऐसे ही.. हाँ.. हाआँ.. ऐसे ही चोद अपनी मम्मी को.. जियो मेरे लाल.. हाय.. मैं मरीईई.. उंगघ… और ज़ोर लगा बेटा.. मम्मी की चूत जितने ज़ोर से चोद सकता है.. चोद दे.. आह्ह..।’ दिव्या अपनी बाँहें उसके कंधों पर लपेटे हुए उसे ज़ोर से गले लगा लेती है। गहरी साँसें लेते हुए उसका कराहना अब चीखने में बदल जाता है।
जब वो अपनी चूत से उसके लण्ड को ज़ोर से भींचती है तो उसकी मादक चीखें कमरे को रंगीन बना देती हैं।
‘चोद बेटा.. चोद.. अपनी मदर को चोद.. मादरचोद..’

रवि अपनी माँ के कंधे पर सिर रखकर एक गहरी साँस लेता है और फिर अपने जिस्म की पूरी ताक़त लगाते हुए अपनी मॉम की चुदाई करने लगता है, उसके कूल्हे अति व्यग्रता से अपनी माँ की जाँघों में ऊपर-नीचे होते हैं। वो किसी घोड़े या गधे की तरह हुंकार भरते हुए अपने भालेनुमा लंबे और मोटे लण्ड को मॉम की मलाईदार चूत में पेलता है।
दिव्या को अपने अन्दर फिर से रस उमड़ता हुआ महसूस होता है और लौड़े से पूरी भरी पड़ी उसकी प्यारी चूत बुरी तरह संकुचित होते हुए.. बेटे के लण्ड को और भी कस लेती है।

‘मैं फिर से झड़ने वाली हूँ बेटा.. चोद मम्मी को.. मार मेरी चूत.. उंगघ.. हाय मैं आ रही हूँ बेटा.. ओह्ह..’

उसकी चूत मन्त्रमुग्ध कर देने वाले स्खलन के सुखद अहसास से फूट पड़ती है और उससे चुदाई का गाढ़ा रस बहकर बाहर आने लगता है, चूत की संकरी गुलाबी दीवारें बेटे के उस भयंकर लण्ड को कसते हुए उसे भींचती हैं, दिव्या का पूरा शरीर काँपने लगता है। रवि भी अपना पूरा लण्ड मम्मी की चूत में जड़ तक पेलते हुए उस पर ढेर हो जाता है।

उसके लण्ड से दूसरी बार गाढ़ा रस फूट पड़ता है। दिव्या अपनी चूत की गहराई में वीर्य की भारी बौछार गिरती हुई महसूस करती है और उसकी चूत गरम और गाढ़े रस से लबालब भर जाती है।

अति कामोत्तेजित मॉम अपनी चूत की मांसपेशियों को बेटे के लण्ड पर ढीला करते हुए.. उसे अपने टट्टों में भरे हुए रस का भंडार.. अपनी चूत में खाली करने में मदद करती है। लेकिन वो अपने मन में अभी से अपराध बोध.. शर्म और घृणा लौटते हुए महसूस कर रही थी कि उसने खुद पर नियंत्रण रखने की बजाए अपने बेटे से अपनी चूत चुदाई की जबरदस्त इच्छा के आगे घुटने टेक दिए थे।

‘यह पहली और आख़िरी बार था…’ वो अपने मन में सोचती है।
वो इस तरह खुद के साथ जिंदगी नहीं जी सकती थी कि जब भी उसके बेटे का लण्ड खड़ा होगा.. तो वो उसे चूस कर जा अपनी चूत में लेकर शान्त करेगी।
‘नहीं में दोबारा ऐसा हरगिज़ नहीं होने दूँगीं..’ वो सोचती है।
दोस्तो, आपको यह कहानी कैसी लगी..?????

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