लंबी चुदाई-माँ बेटा के प्यार की कहानी-3

incest पिछले भाग से आगे-
मेरे लण्ड के सुपारे से निकली एक एक बूंद चुस जाने के बाद माँ ने अपने होंठों को मेरे लण्ड पर से हटा लिया और मुस्कुराती हुई मुझे देखने लगी और बोली- कैसा लगा?
मैंने कहा- बहुत अच्छा।
और बिस्तर पर एक तरफ लुढ़क गया।
मेरे साथ-साथ माँ भी लुढ़क के मेरे बगल में लेट गई और मेरे होंठों और गालों को थोड़ी देर तक चूमती रही।
थोड़ी देर तक आंखें बंद कर के पड़े रहने के बाद जब मैं उठा तो देखा कि माँ ने अपनी आंखें बंद कर रखी हैं और अपने हाथों से
अपनी चूचियों को हल्के हल्के सहला रही थी।
मैं उठ कर बैठ गया और धीरे से माँ के पैरों के पास चला गया। माँ ने अपना एक पैर मोड़ रखा था और एक पैर सीधा करके रखा हुआ था, उसका पेटिकोट उसकी जांघों तक उठा हुआ था, पेटिकोट के ऊपर और नीचे के भागों के बीच में एक गैप सा बन गया था, उस गैप से उसकी जांघ, अन्दर तक नजर आ रही थी। उसकी गुदाज जांघों के ऊपर हाथ रख कर मैं हल्का सा झुक गया अन्दर तक देखने के लिये।

हाँलाकि अंदर रोशनी बहुत कम थी, परन्तु फिर भी मुझे उसकी काली काली झांटों के दर्शन हो गए।
झांटों के कारण चूत तो नहीं दिखी, परन्तु चूत की खुशबू जरूर मिल गई।
तभी माँ ने अपनी आँखें खोल दी और मुझे अपनी जांघों के बीच झांकते हुए देख कर बोली- हाय दैया, उठ भी गया तू? मैं तो सोच
रही थी, अभी कम से कम आधा घंटा शांत पड़ा रहेगा, और मेरी जांघों के बीच क्या कर रहा है? देखो इस लड़के को, बुर देखने के
लिये दीवाना हुआ बैठा है।
फिर मुझे अपनी बांहों में भर कर, मेरे गाल पर चुम्मी काट कर बोली- मेरे लाल को अपनी माँ की बुर देखनी है ना, अभी दिखाती हूँ मेरे
छोरे। हाय मुझे नहीं पता था कि तेरे अंदर इतनी बेकरारी है बुर देखने की।

मेरी भी हिम्मत बढ़ गई थी- हाय माँ, जल्दी से खोलो और दिखा दो।
‘अभी दिखाती हूँ, कैसे देखेगा, बता ना?’
‘कैसे क्या माँ, खोलो ना बस जल्दी से।’
‘तो ले, ये है मेरे पेटिकोट का नाड़ा, खुद ही खोल के माँ को नंगी कर दे और देख ले।’
‘हाय माँ, मेरे से नहीं होगा, तुम खोलो ना।’
‘क्यों नहीं होगा? जब तू पेटिकोट ही नहीं खोल पायेगा, तो आगे का काम कैसे करेगा?’

‘हाय माँ, आगे का भी काम करने दोगी क्या?’
मेरे इस सवाल पर माँ ने मेरे गालों को मसलते हुए पूछा- क्यों, आगे का काम नहीं करेगा क्या? अपनी माँ को ऐसे ही प्यासा छोड़ देगा? तू तो कहता था कि तुझे ठण्डा कर दूँगा, पर तू तो मुझे गर्म करके छोड़ने की बात कर रहा है।
‘हाय माँ, मेरा ये मतलब नहीं था, मुझे तो अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा कि तुम मुझे और आगे बढ़ने दोगी।’

‘गधे के जैसा लण्ड होने के साथ-साथ तेरा तो दिमाग भी गधे के जैसा ही हो गया है। लगता है, सीधा खुल कर ही पूछना पड़ेगा- बोल चोदेगा मुझे, चोदेगा अपनी माँ को, माँ की बुर चाटेगा, और फिर उसमें अपना लौड़ा डालेगा? बोल ना?’
‘हाय माँ, सब करूँगा, सब करूँगा, जो तू कहेगी वो सब करूँगा। हाय, मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है कि मेरा सपना सच होने जा रहा है। ओह, मेरे सपनों में आने वाली परी के साथ सब कुछ करने जा रहा हूँ।’
‘क्यों, सपनों में तुझे और कोई नहीं, मैं ही दिखती थी क्या?’
‘हाँ माँ, तुम्ही तो हो मेरे सपनो की परी! पूरे गाँव में तुमसे सुन्दर कोई नहीं।’
‘हाय, मेरे जवान छोकरे को उसकी माँ इतनी सुन्दर लगती है क्या?’
‘हाँ माँ, सच में तुम बहुत सुन्दर हो और मैं तुम्हें बहुत दिनों से चो…ओ…!’
‘हाँ हाँ, बोलना क्या करना चाहता था? अब तो खुल कर बात कर बेटे, शर्मा मत अपनी माँ से, अब तो हमने शर्म की हर वो दीवार गिरा दी है जो जमाने ने हमारे लिये बनाई है।
‘हाय माँ, मैं कब से तुम्हें चोदना चाहता था, पर कह नहीं पाता था।’
‘कोई बात नहीं बेटा, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, वो भला हुआ कि आज मैंने खुद ही पहल कर दी। चल आ देख अपनी माँ को नंगी, और आज से बन जा उसका सैयाँ।’
कह कर माँ बिस्तर से नीचे उतर गई और मेरे सामने आकर खड़ी हो गई, फिर धीरे धीरे अपने ब्लाउज़ के एक एक बटन को खोलने लगी।
ऐसा लग रहा था जैसे चाँद बादलों में से निकल रहा है।

धीरे धीरे उसकी गोरी गोरी चूचियाँ दिखने लगी। ओह, गजब की चूचियाँ थी, देखने से लग रहा था जैसे कि दो बड़े नारियल दोनों तरफ लटक रहे हों, एकदम गोल और आगे से नुकीले तीर के जैसे! चूचियों पर नसों की नीली रेखायें स्पष्ट दिख रही थी, निप्पल थोड़े मोटे
और एकदम खड़े थे और उनके चारों तरफ हल्का गुलाबीपन लिये हुए गोल घेरा था, निप्पल भूरे रंगे के थे।

माँ अपने हाथों से अपनी चूचियों को नीचे से पकड़ कर मुझे दिखाती हुई बोली- पसन्द आई अपनी माँ की चूचियाँ? कैसी लगी बेटा बोल ना? फिर आगे का दिखाऊँगी।
‘हाय माँ, तुम सच में बहुत सुन्दर हो। ओह, कितनी सुन्दर चु उ उ चियाँ हैं, ओह!’

माँ ने अपनी चूचियों पर हाथ फेरते हुए और अच्छे से मुझे दिखाते हुये हल्का सा हिलाया और बोली- खूब सेवा करनी होगी इनकी तुझे। देख कैसे शान से सिर उठाये खड़ी हैं इस उमर में भी। तेरे बाप के बस का तो है नहीं, अब तू ही इन्हें सम्भालना।
कह कर वह फिर अपने हाथों को अपने पेटिकोट के नाड़े पर ले गई और बोली- अब देख बेटा, तेरे को ज़न्नत का दरवाजा दिखाती हूँ। अपनी माँ का स्पेशल मालपुआ देख, जिसके लिये तू इतना तरस रहा था।
कह कर माँ ने अपने पेटिकोट के नाड़े को खोल दिया, पेटिकोट उसकी कमर से सरसराते हुए सीधा नीचे गिर गया और माँ ने एक पैर से पेटिकोट को एक तरफ उछाल कर फेंक दिया और बिस्तर के और नजदिक आ गई, फिर बोली- हाय बेटा, तूने तो मुझे एकदम
बेशर्म बना दिया।
फिर मेरे लण्ड को अपनी मुठ्ठी में भर कर बोली- ओह, तेरे इस सांड जैसे लन्ड ने तो मुझे पागल बना दिया है, देख ले अपनी माँ को जी भर कर।

मेरी नजरें माँ की जाँघों के बीच में तिकी हुई थी। माँ की गोरी गोरी चिकनी रानों के बीच में काली काली झांटों का एक त्रिकोण बना हुआ था। झांटें बहुत ज्यादा बड़ी नहीं थी।
झांटों के बीच में से उसकी गुलाबी चूत की हल्की झलक मिल रही थी।
मैंने अपने हाथों को माँ की जांघों पर रखा और थोड़ा नीचे झुक कर ठीक चूत के पास अपने चेहरे को ले जाकर देखने लगा।

माँ ने अपने दोनों हाथों को मेरे सिर पर रख दिया और मेरे बालों से खेलने लगी, फिर बोली- रुक जा, ऐसे नहीं दिखेगा, आराम से
बिस्तर पर लेट कर तुझे दिखाती हूँ।
‘ठीक है, आ जाओ बिस्तर पर।’
माँ एक बार जरा पीछे घूम जाओ ना!’
‘ओह, मेरा राजा मेरा पिछवाड़ा भी देखना चाहता है क्या? चल, पिछवाड़ा तो मैं तुझे खड़े खड़े ही दिखा देती हूँ। ले देख अपनी माँ के चूतड़ और गाण्ड को।’
इतना कह कर माँ पीछे घूम गई।
ओह, कितना सुन्दर दृश्य था वो। इसे मैं अपनी पूरी जिन्दगी में कभी नहीं भूल सकता।
माँ के चूतड़ सच में बड़े खूबसूरत थे, एकदम मलाई जैसे, गोल मटोल, गुदाज, माँसल… और उन चूतड़ों के बीच में एक गहरी लकीर सी बन रही थी, जो कि उसकी गांड की खाई थी।
मैंने माँ को थोड़ा झुकने को कहा तो माँ झुक गई और आराम से दोनों मक्खन जैसे चूतड़ों को पकड़ कर अपने हाथों से मसलते हुए, उनके बीच की खाई को देखने लगा।

दोनों चूतड़ों के बीच में गाण्ड का भूरे रंग का छेद फकफका रहा था, एकदम छोटा सा गोल छेद।
मैंने हल्के-से अपने हाथ को उस छेद पर रख दिया और हल्के हल्के उसे सहलाने लगा, साथ में मैं चूतड़ों को भी मसल रहा था।
पर तभी माँ आगे घूम गई- चल मैं थक गई खड़े खड़े, अब जो करना है बिस्तर पर करेंगे।’
और वो बिस्तर पर चढ़ गई।

पलंग की पुश्त से अपने सिर को टिका कर उसने अपने दोनों पैरों को मेरे सामने खोल कर फैला दिया और बोली- अब देख ले आराम से, पर एक बात तो बता, तू देखने के बाद क्या करेगा? कुछ मालूम भी है तुझे या नहीं है?
‘माँ, चोदूँगा… आअ…’
‘अच्छा चोदेगा? पर कैसे? जरा बता तो सही कैसे चोदेगा?’
‘हाय, मैं पहले तुम्हारी चूची चूस्स…ना चाहता हूँ।’

‘चल ठीक है, चूस लेना, और क्या करेगा?’
‘ओह और!!?? औररररर चूत देखूँगा और फिर मुझे पता नहीं।’
‘पता नहीं !! यह क्या जवाब हुआ? पता नहीं? जब कुछ पता नहीं तो माँ पर डोरे क्यों डाल रहा था?’
‘ओह माँ, मैंने पहले किसी को किया नहीं है ना, इसलिये मुझे पता नहीं है। मुझे बस थोड़ा बहुत पता है जो मैंने गांव के लड़कों के साथ सीखा था।’
‘तो गाँव के छोकरों ने यह नहीं सिखाया कि कैसे किया जाता है? सिर्फ़ यही सिखाया कि माँ पर डोरे डालो।’
‘ओह माँ, तू तो समझती ही नहीं। अरे, वो लोग मुझे क्यों सिखाने लगे कि तुम पर डोरे डालो। वो तो… वो तो तुम मुझे बहुत सुन्दर लगती हो इसलिये मैं तुम्हें देखता था।’

‘ठीक है, चल तेरी बात समझ गई बेटा कि मैं तुझे सुन्दर लगती हूँ। पर मेरी इस सुन्दरता का तू फायदा कैसे उठायेगा, उल्लू यह भी
तो बता देना कि सिर्फ़ देख कर मुठ मार लेगा?’
‘हाय माँ नहीं, मैं तुम्हें चोदना चाहता हूँ। माँ तुम सिखा देना, सिखा दोगी ना?’
कह कर मैंने बुरा सा मुंह बना लिया।

‘हाय मेरा बेटा, देखो तो माँ की लेने के लिये कैसे तड़प रहा है? आ जा मेरे प्यारे, मैं तुझे सब सिखा दूँगी। तेरे जैसे लंड वाले बेटे को तो कोई भी माँ सिखाना चाहेगी। तुझे तो मैं सिखा पढ़ा कर चुदाई का बादशाह बना दूँगी। आ जा, पहले अपनी माँ की चूचियों से खेल ले जी भर के, फिर तुझे चूत से खेलना सिखाती हूँ बेटा।’

मैं माँ की कमर के पास बैठ गया।

माँ पूरी नंगी तो पहले से ही थी, मैंने उसकी चूचियों पर अपना हाथ रख दिया और उनको धीरे-धीरे सहलाने लगा। मेरे हाथ में शायद दुनिया की सबसे खूबसूरत चूचियाँ थी। ऐसी चूचियाँ जिनको देख कर किसी का भी दिल मचल जाये।
मैं दोनों चूचियों की पूरी गोलाई पर हाथ फेर रहा था, चूचियाँ मेरी हथेली में नहीं समा रही थी। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं ज़न्नत में घूम रहा हूँ। माँ की चूचियों का स्पर्श गजब का था, मुलायम, गुदाज और सख्त गठीलापन, यह सब एहसास शायद अच्छी गोल मटोल चूचियों को दबा कर ही पाया जा सकता है। मुझे इन सारी चीजों का एक साथ आनन्द मिल रहा था।

ऐसी चूची दबाने का सौभाग्य नसीब वालों को ही मिलता है। इस बात का पता मुझे अपने जीवन में बहुत बाद में चला, जब मैंने दूसरी
अनेक तरह की चूचियों का स्वाद लिया।

माँ के मुख से हल्की हल्की आवाजें आनी शुरु हो गई थी और उसने मेरे चेहरे को अपने पास खींच लिया और अपने तपते हुए गुलाबी होंठों का पहला अनूठा स्पर्श मेरे होंठों को दिया।
हम दोनों के होंठ एक दूसरे से मिल गये और मैं माँ की दोनों चूचियों को पकड़े हुए उसके होंठों का रस ले रहा था। कुछ ही सेकन्ड में हमारी जीभ आपस में टकरा रही थी।
मेरे जीवन का यह पहला चुम्बन करीब दो तीन मिनट तक चला होगा।
माँ के पतले होंठों को अपने मुख में भर कर मैंने चूस चूस कर और लाल कर दिया। जब हम दोनों एक दूसरे से अलग हुए तो दोनों हाँफ रहे थे।

मेरे हाथ अब भी उसकी दोनों चूचियाँ पर थे और मैं अब उनको जोर जोर से मसल रहा था। माँ के मुख से अब और ज्यादा तेज सिसकारियाँ निकलने लगी थी, माँ ने सिसकारते हुए मुझसे कहा- ओह… ओह… सिस्स… सी… सी… सश्सह्… शाबाश, ऐसे ही प्यार कर मेरी चूचियों से। हल्के हल्के आराम से मसल बेटा, ज्यादा जोर से नहीं, नहीं तो तेरी माँ को मजा नहीं आयेगा, धीरे धीरे मसल!

मेरे हाथ अब माँ की चूचियों के निप्पल से खेल रहे थे, उसके निप्पल अब एकदम सख्त हो चुके थे, हल्का कालापन लिये हुए गुलाबी रंग के निप्पल खड़े होने के बाद ऐसे लग रहे थे जैसे दो गोरी, गुलाबी पहाड़ियों पर बादाम की गिरी रख दी गई हो।
निप्पलों के चारों ओर उसी रंग का घेरा था।
ध्यान से देखने पर मैंने पाया कि उस घेरे पर छोटे-छोटे दाने से उगे हुए थे। मैं निप्पलों को अपनी दो उंगलियों के बीच में लेकर धीरे धीरे मसल रहा था और प्यार से उनको खींच रहा था।
जब भी मैं ऐसा करता तो माँ की सिसकारियाँ और तेज हो जाती थी।

माँ की आँखें एकदम नशीली हो चुकी थी और वो सिसकारियाँ लेते हुए बड़बड़ाने लगी- ओह, बेटा ऐसे ही… ऐसे ही, तुझे तो सिखाने की भी जरूरत नहीं है रे। ओह क्या खूब मसल रहा है मेरे प्यारे… ऐसे ही… कितने दिन हो गये जब इन चूचियों को किसी मर्द के हाथ ने मसला है या प्यार किया है। कैसे तरसती थी मैं कि काश कोई मेरी इन चूचियों को मसल दे, प्यार से सहला दे, पर आखिर में अपना बेटा ही काम आया। आजा मेरे लाल।
कहते हुए उसने मेरे सिर को पकड़ कर अपनी चूचियों पर झुका लिया।

मैं माँ का इशारा समझ गया और मैंने अपने होंठ माँ की चूचियों से भर लिये। मेरे एक हाथ में उसकी एक चूची थी और दूसरी चूची पर मेरे होंठ चिपके हुए थे।
मैंने धीरे धीरे उसकी चूचियों को चूसना शुरु कर दिया था, मैं ज्यादा से ज्यादा चूची को अपने मुँह में भर कर चूस रहा था। मेरे अन्दर का खून इतना उबाल मारने लगा था कि एक दो बार मैंने अपने दाँत भी चूचियों पर गड़ा दिए थे जिससे माँ के मुँह से अचानक चीख निकल गई थी।
पर फिर भी उसने मुझे रोका नहीं, वो अपने हाथों को मेरे सिर के पीछे ले जाकर मुझे बालों से पकड़ कर मेरे सिर को अपनी चूचियों पर और जोर जोर से दबा रही थी और दाँत से काटने पर एकदम घुटी घुटी आवाज में चीखते हुए बोली- ओह धीरे बेटा, धीरे से चूस चूची
को। ऐसे जोर से नहीं काटते हैं।

फिर उसने अपनी चूची को अपने हाथ से पकड़ा और उसको मेरे मुँह में घुसाने लगी। ऐसा लग रहा था जैसे वो अपनी चूची को पूरी की पूरी मेरे मुँह में घुसा देना चाहती हो और सिसकार कए बोली- ओह राजा बेटा, मेरे निप्पल को चूस जरा, पूरे निप्पल को मुँह में भर कर कस कस के चूस राजा। जैसे बचपन में दूध पीने के लिये चूसता था।

मैंने अब अपना ध्यान निप्पल पर कर दिया और निप्पल को मुंह में भर कर अपनी जीभ उसकी चारों तरफ गोल गोल घुमाते हुए चूसने लगा।
मैं अपनी जीभ को निप्पल के चारों तरफ के घेरे पर भी फिरा रहा था। निप्पल के चारों तरफ के घेरे पर उभरे हुए दानों को अपनी जीभ से कुरेदते हुए निप्पल को चूसने पर माँ एकदम मस्त हुए जा रही थी और उसके मुख से निकलने वाली सिसकारियाँ इसकी गवाही दे रही थी।

मैं उसकी चीखें और सिसकारियाँ सुन कर पहले पहल तो डर गया था। पर माँ के द्वारा समझाये जाने पर कि ऐसी चीखें और सिसकारियाँ इस बात को बता रही हैं कि उसे मजा आ रहा है तो फिर मैं दोगुने जोश के साथ अपने काम में जुट गया, जिस चूची को मैं चूस रहा था, वो अब पूरी तरह से मेरी लार और थूक से भीग चुकी थी और लाल हो चुकी थी, फिर भी मैं उसे चूसे जा रहा था।

तब माँ ने मेरे सिर को वहाँ से हटा के अपनी दूसरी चूची की तरफ करते हुए कहा- हाय, केवक इसी एक चूची को चूसता रहेगा, दूसरी को भी चूस, इसमें भी मज़ेदार स्वाद है।
फिर अपनी दूसरी चूची को मेरे मुँह में घुसाते हुई बोली- इसको भी चूस चूस कर लाल कर दे मेरे लाल, दूध निकाल दे मेरे सैंय्या। एकदम आम जैसे चूस और सारा रस निकाल दे अपनी माँ की चूचियों का। किसी काम की नहीं हैं ये, कम से कम मेरे लाल के काम तो आएँगी।

मैं फिर से अपने काम में जुट गया और पहली वाली चूची दबाते हुए, दूसरी को पूरे मनोयोग से चूसने लगा।

माँ सिसकारियाँ ले रही थी और चूची चुसवा रही थी, कभी कभी अपना हाथ मेरी कमर के पास लेजा कर मेरे लोहे जैसे तने हुए लंड को पकड़ कर मरोड़ रही थी। कभी अपने हाथों से मेरे सिर को अपनी चूचियों पर दबा रही थी।
इस तरह काफ़ी देर तक मैं उसकी चूचियों को चूसता रहा।

फिर माँ ने खुद अपने हाथों से मेर सिर पकड़ के अपनी चूचियों पर से हटाया और मुस्कुराते मेरे चेहरे की ओर देखने लगी।
मेरे होंठ मेरे खुद के थूक से भीगे हुए थे, माँ की बांयी चूची अभी भी मेरे लार से चमक रही थी, जबकि दाहिनी चूची पर लगा थूक सूख चुका था पर उसकी दोनों चूचियाँ लाल हो चुकी थी और निप्पलों का रंग हल्के काले से पूरा काला हो चुका था (ऐसा बहुत ज्यादा चूसने पर खून का दौर भर जाने के कारण हुआ था।

माँ ने मेरे चेहरे को अपने होंठों के पास खींच कर मेरे होंठों पर एक गहरा चुम्बन लिया और अपनी कातिल मुस्कुराहट फेंकते हुए मेरे
कान के पास धीरे से बोली- सिर्फ़ दूध ही पीयेगा या मालपुआ भी खायेगा? देख तेरा मालपुआ तेरा इन्तजार कर रहा है राजा।
मैंने भी माँ के होंठो का चुम्बन लिया और फिर उसके भरे-भरे गालों को अपने मुँह में भर कर चूसने लगा और फिर उसके नाक को चूम और फिर धीरे से बोला- ओह माँ, तुम सच में बहुत सुन्दर हो।
इस पर माँ ने पूछा- क्यों, मजा आया ना चूसने में?

‘हाँ माँ, गजब का मजा आया, मुझे आज तक ऐसा मजा कभी नहीं आया था।’
तब माँ ने अपने पैरों के बीच इशारा करते हुए कहा- नीचे और भी मजा आयेगा। यह तो केवल तिजोरी का दरवाजा है, असली खजाना तो नीचे है। आ जा बेटे, आज तुझे असली मालपुआ खिलाती हूँ।
मैं धीरे से खिसक कर माँ के पैरो पास आ गया, माँ ने अपने पैरों को घुटनो के पास से मोड़ कर फैला दिया और बोली- यहाँ बीच में दोनों पैरों के बीच में आकर बैठ, तब ठीक से देख पायेगा, अपनी माँ का खजाना!
मैं उठ कर माँ के दोनों पैरों के बीच घुटनों के बल बैठ गया और आगे की ओर झुका, मेरे सामने वो चीज़ थी, जिसको देखने के लिए
मैं मरा जा रहा था।

माँ ने अपनी दोनों जांघें फैला दी और अपने हाथों को अपनी बुर के ऊपर रख कर बोली- ले देख ले अपना मालपुआ… अब आज के बाद से तुझे यही मालपुआ खाने को मिलेगा।’

मेरी खुशी का तो ठिकाना नहीं था। सामने माँ की खुली जांघों के बीच झांटों का एक त्रिकोण सा बना हुआ था, इस त्रिकोणीय झांटों के जंगल के बीच में से माँ की फ़ूली हुए गुलाबी चूत का छेद झांक रहा था जैसे बादलों के झुरमुट में से चाँद झाँकता है।
मैंने अपने काम्पते हाथों को माँ की चिकनी जांघों पर रख दिया और थोड़ा सा झुक गया। उसकी चूत के बाल बहुत बड़े नहीं थे, छोटे छोटे घुंघराले बाल और उनके बीच एक गहरी लकीर से चीरी हुई थी।

मैंने अपने दाहिने हाथ को जांघ पर से उठा कर हकलाते हुये पूछा- माँ, मैं इसे छू लूँ?
‘छू ले, तेरे छूने के लिये ही तो खोल कर बैठी हूँ।’
मैंने अपने हाथों को माँ की चूत को ऊपर रख दिया, झांट के बाल एकदम रेशम जैसे मुलायम लग रहे थे।
हालांकि आम तौर पर झांट के बाल थोड़े मोटे होते हैं और उसकी झांट के बाल भी मोटे ही थे पर मुलायम भी थे। हल्के हल्के मैं उन बालों पर हाथ फिराते हुए उनको एक तरफ करने की कोशिश कर रह था। अब चूत की दरार और उसकी मोटी-मोटी फांकें स्पष्ट रूप से
दिख रही थी।
माँ की बुर एक फ़ूली हुई और गद्देदार लगती थी, चूत की मोटी मोटी फांकें बहुत आकर्षक लग रही थी, मेरे से रहा नहीं गया और मैं बोल पड़ा- ओह माँ, यह तो सचमुच में मालपुए के जैसी फ़ूली हुई है।
‘हाँ बेटा, यही तो तेरा असली मालपुआ है। आज के बाद जब भी मालपुआ खाने का मन करे, यही खाना।’
‘हाँ माँ, मैं तो हमेशा यही मालपुआ खाऊँगा। ओह माँ, देखो ना इससे तो रस भी निकल रहा है।’
चूत से रिसते हुए पानी को देख कर मैंने कहा।
‘बेटा, यही तो असली माल है हम औरतों का। यह रस मैं तुझे अपनी बुर की थाली में सजा कर खिलाऊँगी। दोनों फांकों को खोल कर देख कैसी दिखती है? हाथ से दोनों फांक पकड़ कर, खींच कर बुर को चिरोड़ कर देख।’

सच बताता हूँ, दोनों फांकों को चीर कर मैंने जब चूत के गुलाबी रस से भीगे छेद को देखा, तो मुझे यही लगा कि मेरा तो जन्म सफल हो गया है। चूत के अंदर का भाग एकदम गुलाबी था और रस भीगा हुआ था, जब मैंने उस छेद को छुआ तो मेरे हाथों में चिपचिपा सा रस लग गया।मैंने उस रस को वहीं बिस्तर की चादर पर पौंछ दिया और अपने सिर को आगे बढ़ा कर माँ की बुर को चूम लिया।

माँ ने इस पर मेरे सिर को अपनी चूत पर दबाते हुए हल्के से सिसकारते हुए कहा- बिस्तर पर क्यों पोंछ दिया, उल्लू? यही माँ का असली प्यार है जो तेरे लंड को देख कर चूत के रास्ते छलक कर बाहर आ रहा है। इसको चख कर देख, चूस ले इसको।

‘हाय माँ, चूस लूँ मैं तेरी चूत को? हाय माँ, चाटूँ इसको?’
‘हाँ बेटा चाट ना, चूस ले अपनी माँ की चूत के सारे रस को, दोनों फांकों को खोल कर उसमें अपनी जीभ डाल दे और चूस। और ध्यान से देख, तू तो बुर की केवल फांकों को देख रहा है, देख मैं तुझे दिखाती हूँ।’

और माँ ने अपनी चूत को पूरा चिरोड़ दिया और अंगुली रख कर बताने लगी- देख, यह जो छोटा वाला छेद है ना, वो मेरे पेशाब करने
वाला छेद है। बुर में दो दो छेद होते हैं, ऊपर वाला पेशाब करने के काम आता है और नीचे वाला जो यह बड़ा छेद है, वो चुदवाने के काम आता है। इसी छेद में से रस निकलता है ताकि मोटे से मोटा लंड आसानी से चूत को चोद सके। और बेटा यह जो पेशाब वाले छेद के ठीक ऊपर जो यह नुकीला सा निकला हुआ है, वो भगनासा कहलाता है, यह औरत को गर्म करने का अंतिम हथियार है, इसको छूते ही औरत एकदम गरम हो जाती है, समझ में आया?

‘हाँ माँ, आ गया समझ में! हाय, कितनी सुन्दर है यह तुम्हारी बुर… मैं चाट लूँ इसे माँ?’
‘हाँ बेटा, अब तू चाटना शुरु कर दे, पहले पूरी बुर के ऊपर अपनी जीभ को फिरा कर चाट, फिर मैं आगे बताती जाती हूँ, कैसे करना
है?’

मैंने अपनी जीभ निकाल ली और माँ की फ़ुद्दी पर अपनी जुबान को फिराना शुरु कर दिया। पूरी चूत के ऊपर मेरी जीभ चल रही थी।
मैं फ़ूली हुई गद्देदार बुर को अपनी खुरदरी जुबान से, ऊपर से नीचे तक चाट रहा था। अपनी जीभ को दोनों फांकों के ऊपर फेरते हुए मैंने ठीक बुर की दरार पर अपनी जीभ रखी और मैं धीरे धीरे ऊपर से नीचे तक चूत की पूरी दरार पर जीभ को फिराने लगा।

बुर से रिस रिस कर निकलता हुआ रस जो बाहर आ रहा था, उसका नमकीन स्वाद मुझे मिल रहा था। जीभ जब चूत के ऊपरी भाग में पहुंच कर भगन से टकराती थी तो माँ की सिसकारियाँ और भी तेज हो जाती थी।

माँ ने अपने दोनों हाथों को शुरू में तो कुछ देर तक अपनी चूचियों पर रख था और अपनी चूचियों को अपने हाथ से ही दबाती रही। मगर बाद में उसने अपने हाथों को मेरे सर के पीछे लगा दिया और मेरे बालों को सहलाते हुए मेरे सर को अपनी चूत पर दबाने लगी।
मेरी चूत चुसाई बदस्तूर जारी थी और अब मुझे इस बात का अंदाज हो गया था कि माँ को सबसे ज्यादा मजा अपनी भगन की चुसाई में आ रहा है। इस लिए मैंने इस बार अपनी जीभ को नुकीला करके उससे भिड़ा दिया और केवल भगन पर अपनी जीभ को तेजी से चलाने लगा।
मैं बहुत तेजी के साथ उसके ऊपर जीभ चला रहा था और फिर पूरी भगनासा को अपने होंठों के बीच दबा कर जोर जोर से चूसने लगा।
माँ ने उत्तेजना में अपने चूतड़ों को ऊपर उछाल दिया और जोर से सिसकारियाँ लेते हुये बोली- हाय दैया, उई माँ, शीस्स शीस्श, चूस ले, ओह, चूस ले, मेरे भगनासा को। ओह, शीस्सह, क्या खूब चूस रहा है रे तू? ओह म…मैंने तो सोचा भी नहीं थाआआअ… कि तेरी जीभ ऐसा कमाल करेगी। हाय रे, बेटाआअ, तू तो कमाल का निकला… आहह… ओओह… ओह ऐसे ही चूस, अपने होंठों के बीच में भगनासा को भर कर, इसी तरह से चूस ले, ओह बेटा चूस, चूस बेटा!
माँ के उत्साह बढ़ाने पर मेरी उत्तेजना अब दुगुनी हो चुकी थी। मैं दोगुने जोश के साथ एक कुत्ते की तरह से लपलप करते हुए, पूरी बुर को चाटे जा रहा था।
अब मैं चूत के भगनासा के साथ साथ पूरी बुर के मांस को अपने मुँह में भर कर चूस रहा था और माँ की मोटी फ़ूली हुई चूत अपनी झांटों समेत मेरे मुँह में थी। पूरी फ़ुद्दी को एक बार रसगुल्ले की तरह से मुँह में भर कर चूसने के बाद मैंने अपने होंठों को खोल कर
चूत के चोदने वाले छेद के सामने टिका दिया और बुर के होंठों से अपने होंठों को मिला कर मैंने खूब जोर जोर से चूसना शुरु कर दिया।
बुर का नशीला रस रिस रिस कर निकल रहा था और सीधे मेरे मुख में जा रहा था।
मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं चूत को ऐसे चूसूँगा या फिर चूत की चुसाई ऐसे की जाती है। पर शायद चूत सामने देख कर चूसने की कला अपने आप आ जाती है।
फुद्दी और जीभ की लड़ाई अपने आप में ही इतनी मजेदार होती है कि इसे सीखने और सिखाने की जरूरत नहीं पड़ती।
बस जीभ को फुद्दी दिखा दो, बाकी का काम जीभ अपने आप कर लेती है।

माँ की सिसकारियाँ और शाबाशी और तेज हो चुकी थी।
मैंने अपने सिर को हल्का सा उठा कर माँ को देखते हुए, अपनी बुर के रस से भीगे होंठों से माँ से पूछा- कैसा लग रहा है माँ, तुझे अच्छा लग रहा है ना?

माँ ने सिसकाते हुए कहा- हाय बेटा मत पूछ, बहुत अच्छा लग रहा है, मेरे लाल… इसी मजे के लिए तो तेरी माँ तरस रही थी। चूस ले
मेरी बुर कोओओ… ओओह… ओईईह, और जोर से चूस्स…स्स, सारा रस पी ले मेरे सैंया, तू तो जादूगर है रेएएए, तुझे तो कुछ बताने की भी जरूरत नहीं, हाय मेरी बुर की फांकों के बीच में अपनी जीभ डाल कर चूस बेटा, और उसमें अपनी जीभ को लबलबाते हुए अपनी जीभ को मेरी चूत के अंदर तक घुमा दे। हय घुमा दे, राजा बेटा घुमा दे!

माँ के बताये हुए रास्ते पर चलना तो बेटे का फर्ज बनता है, और उस फर्ज को निभाते हुए मैंने बुर की दोनों फांकों को फैला दिया और अपनी जीभ को उसकी चूत में पेल दिया।
बुर के अंदर जीभ घुसा कर पहले तो मैंने अपनी जीभ और ऊपरी होंट के सहारे चूत की एक फाँक को पकड़ कर खूब चूसा, फिर दूसरी फांक के साथ भी ऐसा ही किया।

फिर चूत को जितना चिरोड़ सकता था उतना चिरोड़ कर अपनी जीभ को बुर के बीच में डाल कर उसके रस को चटकारे लेकर चाटने लगा।
चूत का रस बहुत नशीला था और माँ की चूत कामोत्तेजना के कारण खूब रस छोड़ रही थी।
रंगहीन, हल्का चिपचिपा रस चाट कर खाने में मुझे बहुत आनन्द आ रहा था।

माँ घुटी-घुटी आवाज में चीखते हुए बोल पड़ी- ओह चाट, ऐसे ही चाट मेरे राजा, चाट चाट कर मेरे सारे रस को पी जा… हाय रे मेरा बेटा, देखो कैसे कुत्ते की तरह से अपनी माँ की बुर को चाट रहा है। ओह चाट ना, ऐसे ही चाट मेरे कुत्ते बेटे, अपनी कुतिया माँ की बुर को चाट, और उसकी बुर के अन्दर अपनी जीभ को हिलाते हुए मुझे अपनी जीभ से चोद डाल।

मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि एक तो माँ मुझे कुत्ता कह रही है, फिर खुद को भी कुतिया कह रही है। पर मेरे दिलो दिमाग में तो अभी केवल माँ की रसीली बुर की चटाई घुसी हुई थी इसलिए मैंने इस तरफ ध्यान नहीं दिया, माँ की आज्ञा का पालन किया और जैसे उसने बताया था उसी तरह से अपनी जीभ से ही उसकी चूत को चोदना शुरू कर दिया।
मैं अपनी जीभ को तेजी के साथ बुर में से अन्दर बाहर कर रहा था और साथ ही साथ चूत में जीभ को घुमाते हुए चूत के गुलाबी छेद से अपने होंठों को मिला कर अपने मुँह को चूत पर रगड़ भी रहा था।
मेरी नाक बार-बार चूत के भगनासा से टकरा रही थी और शायद वो भी माँ के आनन्द का एक कारण बन रही थी।
मेरे दोनों हाथ माँ की मोटी, गुदाज जांघों से खेल रहे थे।

तभी माँ ने तेजी के साथ अपने चूतड़ों को हिलाना शुरू किया और जोर-जोर से हाँफते हुए बोलने लगी- ओह निकल जायेगा, ऐसे ही बुर में जीभ चलाते रहना बेटा, ओह, सी… सीई शीइ शिशि, साली बहुत खुजली करती थी। आज निकाल दे, इसका सारा पानी।

और अब माँ दांत पीस कर लगभग चीखते हुए बोलने लगी- ओह होओओ ओओह, शीई… ईईशस्स… साले कुत्ते, मेरे प्यारे बेटे, मेरे लाल, हाय रे, चूस और जोर से चूस अपनी माँ की बुर को, जीभ से चोद दे अभी, सीईई ईई चोद नाआआअ कुत्ते, हरामजादे और जोर से चोद सालेएए, चोद डाल अपनी माँ को, हाय निकला रे, मेरा तो निकल गया। ओह मेरे चुदक्कड़ बेटे, निकाल दिया रे… तूने तो अपनी माँ को अपनी जीभ से चोद डाला।
कहते हुए माँ ने अपने चूतड़ों को पहले तो खूब जोर-जोर से ऊपर की तरफ उछाला, फिर अपनी आँखों को बंद करके चूतड़ों को धीरे धीरे फुदकाते हुए झड़ने लगी- ओह गईईईई मैं, मेरे राजाआआ, मेरा निकल गया, मेरे सैंयाआआ। हाय तूने मुझे ज़न्नत की सैर करवा दी रे। हाय मेरे बेटे, ओह, ओह, मैं गई!

माँ की चूत मेरे मुँह पर खुल-बंद हो रही थी। बुर की दोनों फांकों से रस अब भी रिस रहा था पर माँ अब थोड़ी ठण्डी पड़ चुकी थी और उसकी आँखें बंद थी। उसने दोनों पैर फैला दिये थे और सुस्त सी होकर लंबी-लंबी सांसें छोड़ती हुई लेट गई।
मैंने अपनी जीभ से चोद चोद कर अपनी माँ को झाड़ दिया था।

मैंने बुर पर से अपने मुँह को हटा दिया और अपने सिर को माँ की जांघों पर रख कर लेट गया।
कुछ देर तक ऐसे ही लेटे रहने के बाद मैंने जब सिर उठा कर देखा तो पाया कि माँ अब भी अपने आँखों को बंद किये बेसुध होकर लेटी हुई है।

मैं चुपचाप उसके पैरों के बीच से उठा और उसकी बगल में जाकर लेट गया। मेरा लंड फिर से खड़ा हो चुका था पर मैंने चुपचाप लेटना
ही बेहतर समझा और माँ की ओर करवट लेकर मैंने अपने सिर को उसकी चूचियों से सटा दिया और एक हाथ पेट पर रख कर लेट
गया।

मैं भी थोड़ी बहुत थकावट महसूस कर रहा था, हालांकि लंड पूरा खड़ा था और चोदने की इच्छा बाकी थी। मैं अपने हाथों से माँ के पेट, नाभि और जांघों को सहला रहा था। मैं धीरे धीरे यह सारा काम कर रहा था और कोशिश कर रहा था कि माँ ना जागे।
मुझे लग रहा था कि अब तो माँ सो गई है और मुझे शायद मुठ मार कर ही संतोष करना पड़ेगा इसलिये मैं चाह रहा था कि सोते हुए थोड़ा सा माँ के बदन से खेल लूँ और फिर मुठ मार लूँगा।

मुझे माँ की जांघ बड़ी अच्छी लगी और मेरा दिल कर रहा था कि मैं उन्हें चूमूं और चाटूँ।
इसलिये मैं चुपचाप धीरे से उठा और फिर माँ के पैरों के पास बैठ गया।
माँ ने अपना एक पैर फैला रखा था और दूसरे पैर को घुटनों के पास से मोड़ कर रख हुआ था। इस अवस्था में वो बड़ी खूबसूरत लग रही थी, उसके बाल थोड़े बिखरे हुए थे, एक हाथ आँखों पर और दूसरा बगल में था।
पैरों के इस तरह से फैले होने से उसकी बुर और गांड दोनों का छेद स्पष्ट रूप से दिख रहा था।

धीरे धीरे मैं अपने होंठों को उसकी जांघों पर फेरने लगा और हल्की हल्की चुम्मियाँ उसकी रानों से शुरु करके उसके घुटनों तक देने लगा।
एकदम मक्खन जैसी गोरी, चिकनी जांघों को अपने हाथों से पकड़ कर हल्के हल्के मसल भी रहा था। मेरा यह काम थोड़ी देर तक चलता रहा।

तभी माँ ने अपनी आँखें खोली और मुझे अपनी जांघों के पास देख कर वो एकदम से चौंक कर उठ गई और प्यार से मुझे अपनी जांघों के पास से उठाते हुए बोली- क्या कर रहा है बेटे? जरा आँख लग गई थी। देख ना, इतने दिनों के बाद इतने अच्छे से पहली बार मैंने वासना का आनन्द उठाया है। इस तरह पिछली बार कब झड़ी थी, मुझे तो यह भी याद नहीं। इसलिये शायद संतुष्टि और थकान के कारण आँख लग गई।
‘कोई बात नहीं माँ, तुम सो जाओ।’
तभी माँ की नजर मेरे 8.5 इंच के लौड़े की तरफ गई और वो चौंक कर बोली- अरे, ऐसे कैसे सो जाऊँ?
और मेरा लौड़ा अपने हाथ में पकड़ लिया- मेरे लाल का लंड खड़ा होकर बार बार मुझे पुकार रहा है, और मैं सो जाऊँ।
‘ओह माँ, इसको तो मैं हाथ से ढीला कर लूँगा, तुम सो जाओ।’
‘नही मेरे लाल, आ जा जरा-सा माँ के पास लेट जा। थोड़ा दम ले लूँ, फिर तुझे असली चीज का मजा दूंगी।’

मैं उठ कर माँ के बगल में लेट गया। अब हम दोनों माँ बेटे एक दूसरे की ओर करवट लेते हुए एक दूसरे से बातें करने लगे।
माँ ने अपना एक पैर उठाया और अपनी मोटी जांघों को मेरी कमर पर डाल दिया, फिर एक हाथ से मेरे खड़े लौड़े को पकड़ कर उसके सुपारे के साथ धीरे धीरे खेलने लगी।

मैं भी माँ की एक चूची को अपने हाथों में पकड़ कर धीरे धीरे सहलाने लगा और अपने होंठों को माँ के होंठों के पास ले जाकर एक चुम्बन लिया।
माँ ने अपने होंठों को खोल दिया।

चूमा-चाटी खत्म होने के बाद माँ ने पूछा- और बेटे, कैसा लगा माँ की चूत का स्वाद? अच्छा लगा या नहीं?
‘हाय माँ, बहुत स्वादिष्ट था, सच में मजा आ गया।’
‘अच्छा, चलो मेरे बेटे को अच्छा लगा, इससे बढ़ कर मेरे लिए कोई बात नहीं।’

‘माँ, तुम सच में बहुत सुन्दर हो। तुम्हारी चूचियाँ कितनी खूबसूरत है। मैं… मैं क्या बोलूँ? माँ, तुम्हारा तो पूरा बदन खूबसूरत है।’
‘कितनी बार बोलेगा यह बात तू मुझसे? मैं तेरी आँखें नहीं पढ़ सकती क्या? जिनमें मेरे लिये इतना प्यार छलकता है।’

मैं माँ से फ़िर पूरा चिपक गया, उसकी चूचियाँ मेरी छाती में चुभ रही थी और मेरा लौड़ा अब सीधा उसकी चूत पर ठोकर मार रहा था।
हम दोनों एक दूसरे की आगोश में कुछ देर तक ऐसे ही खोये रहे।
फिर मैंने अपने आप को अलग किया और बोला- माँ, एक सवाल करूँ?
‘हां पूछ, क्या पूछना है?’
‘माँ, जब मैं तुम्हारी चूत चाट रहा था, तब तुमने गालियाँ क्यों निकाली?’
‘गालियाँ और मैं? मैं भला क्यों गालियाँ निकालने लगी?’
‘नहीं माँ, तुम गालियाँ निकाल रही थी, तुमने मुझे कुत्ता कहा, और, और खुद को कुतिया कहा, फिर तुमने मुझे हरामी भी कहा।’
‘मुझे तो याद नहीं बेटा कि ऐसा कुछ मैंने तुम्हें कहा था। मैं तो केवल थोड़ा सा जोश में आ गई थी और तुम्हें बता रही थी कि कैसे क्या करना है। मुझे तो एकदम याद नहीं कि मैंने ये शब्द कहे हैं।’

‘नहीं माँ, तुम ठीक से याद करने की कोशिश करो। तुमने मुझे हरामी या हरामजादा कहा था, और खूब जोर से झड़ गई थी।’
‘बेटा, मुझे तो ऐसा कुछ भी याद नहीं है, फिर भी अगर मैंने कुछ कहा भी था तो मैं अपनी ओर से माफी माँगती हूँ, आगे से इन बातों का ख्याल रखूँगी।’
‘नहीं माँ, इसमें माफी माँगने जैसी कोई बात नहीं है। मैंने तो जो तुम्हारे मुँह से सुना, उसे ही तुम्हें बता दिया। खैर जाने दो, तुम्हारा बेटा हूँ, अगर तुम मुझे दस बीस गालियाँ दे भी दोगी तो क्या हो जायेगा?’
‘नहीं बेटा, ऐसी बात नहीं है। अगर मैं तुझे गालियाँ दूँगी तो, हो सकता है तू भी कल को मेरे लिये गालियाँ निकाले और मेरे प्रति तेरा नजरिया बदल जाये, तू मुझे वो सम्मान ना दे, जो आज तक मुझे दे रहा है।’
‘नहीं माँ, ऐसा कभी नहीं होगा। मैं तुम्हें हमेशा प्यार करता रहूँगा और वही सम्मान दूँगा, जो आज तक दिया है। मेरी नजरों में तुम्हारा स्थान हमेशा ऊँचा रहेगा।’
‘ठीक है बेटा, अब तो हमारे बीच एक दूसरी तरह का संबंध स्थापित हो गया है। इसके बाद जो कुछ होता है, वो हम दोनों की आपसी
समझदारी पर निर्भर करता है।’

‘हां माँ, तुमने ठीक कहा, पर माँ अब इन बातों को छोड़ कर क्यों ना असली काम किया जाये? मेरी बहुत इच्छा हो रही है कि मैं तुम्हें चोदूँ। देखो ना माँ, मेरा डण्डा कैसा खड़ा हो गया है?’
‘हां बेटा, वो तो मैं देख ही रही हूँ कि मेरे लाल का हथियार कैसा तड़प रहा है माँ का मालपुआ खाने को! पर उसके लिये तो पहले माँ को एक बार फिर से थोड़ा गर्म करना पड़ेगा बेटा।’

‘हाय माँ, तो क्या अभी तुम्हारा मन चुदवाने का नहीं है?’
‘ऐसी बात नहीं है बेटे, चुदवाने का मन तो है पर किसी भी औरत को चोदने से पहले थोड़ा गर्म करना पड़ता है। इसलिये बुर चाटना, चूची चूसना, चुम्मा चाटी करना और दूसरे तरह के काम किये जाते हैं।’
‘इसका मतलब है कि तुम अभी गर्म नहीं हो और तुम्हें गर्म करना पड़ेगा ये सब करके?’
‘हां, इसका यह मतलब है।’
‘पर माँ तुम तो कहती थी, तुम बहुत गर्म हो और अभी कह रही हो कि गर्म करना पड़ेगा?’
‘अबे उल्लू, गर्म तो मैं बहुत हूँ पर इतने दिनों के बाद इतनी जबरदस्त चूत चटाई के बाद तूने मेरा पानी निकाल दिया है, तो मेरी गर्मी थोड़ी देर के लिये शांत हो गई है। अब तुरन्त चुदवाने के लिये तो गर्म तो करना ही पड़ेगा ना। नहीं तो अभी छोड़ दे, कल तक मेरी गर्मी फिर चढ़ जायेगी और तब तू मुझे चोद लेना।’
‘ओह नहीं माँ, मुझे तो अभी करना है, इसी वक्त।’
‘तो अपनी माँ को जरा गर्म कर दे और फिर मजे ले चुदाई का।’
मैंने फिर से माँ की दोनों चूचियाँ पकड़ ली और उन्हें दबाते हुए उसके होंठों से अपने होंठ भिड़ा दिये।
माँ ने भी अपने गुलाबी होंठों को खोल कर मेरा स्वागत किया और अपनी जीभ को मेरे मुँह में पेल दिया।
माँ के मुँह के रस में गजब का स्वाद था।

हम दोनों एक दूसरे के होंठो को मुँह में भर कर चूसते हुए आपस में जीभ से जीभ लड़ा रहे थे। माँ की चुचियों को अब मैं जोर-जोर से दबाने लगा था और अपने हाथों से उसके माँसल पेट को भी सहला रह था।
उसने भी अपने हाथों के बीच में मेरे लंड को दबोच लिया था और कस-कस के मरोड़ते हुए उसे दबा रही थी।
माँ ने अपना एक पैर मेरी कमर के ऊपर रख दिया था और अपनी जांघों के बीच मुझे बार बार दबोच रही थी।

अब हम दोनों की सांसें तेज चलने लगी थी मेरा हाथ अब माँ की पीठ पर चल रहा था और वहां से फिसलते हुए सीधा उसके चूतड़ों पर
चल गया।
अभी तक तो मैंने माँ के मक्खन जैसे गुदाज चूतड़ों पर उतना ध्यान नहीं दिया था, परन्तु अब मेरे हाथ वहीं पर जाकर चिपक गए थे। ‘ओह, चूतड़ों को हाथों से मसलने का आनन्द ही कुछ और है। मोटे मोटे चूतड़ों के माँस को अपने हाथों में पकड़ कर कभी धीरे, कभी जोर से मसलने का अलग ही मजा है।
चूतड़ों को दबाते हुए मैंने अपनी उंगलियों को चूतड़ों के बीच की दरार में डाल दिया और अपनी उंगलियों से उसके चूतड़ों के बीच की खाई को धीरे धीरे सहलाने लगा।

मेरी उंगलियाँ माँ की गांड के छेद पर धीरे-धीरे तैर रही थी। माँ की गांड का छेद एकदम गर्म लग रहा था।

माँ, जो मेरे गालों को चूस रही थी, अपना मुँह हटा कर बोल उठी- यह क्या कर रह है रे, गांड को क्यों सहला रहा है?
‘हाय माँ, तुम्हारी ये देखने में बहुत सुंदर लगती है, सहलाने दो ना!
‘चूत का मजा लिया नहीं, और चला है गांड का मजा लूटने।’ कह कर माँ हंसने लगी।
मेरी समझ में तो कुछ आया नहीं पर जब माँ ने मेरे हाथों को नहीं हटाया तो मैंने माँ की गांड के पकपकाते छेद में अपनी उंगलियाँ
चलाने की अपने दिल की हसरत पूरी कर ली और बड़े आराम से धीरे धीरे कर के अपनी एक उंगली को हल्के हल्के उसकी गांड के गोल सिकुड़े हुए छेद पर धीरे धीरे चल रहा था।

मेरी उंगली का थोड़ा सा हिस्सा भी शायद गांड में चला गया था पर माँ ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया था।
मैं कुछ देर तक ऐसे ही गांड के छेद को सहलाता और चूतड़ों को मसलता रहा, मेरा मन ही नहीं भर रहा था।

तभी माँ ने मुझे अपनी जांघों के बीच और कस के दबोच कर मेरे गालों पर एक प्यार भरी थपकी लगाई और मुँह बिचकाते हुए बोली- चूतीये, कितनी देर तक चूतड़ और गांड से ही खेलता रहेगा, कुछ आगे भी करेगा या नहीं? चल आ जा और जरा फिर से चूची को चूस तो।
मैंने माँ की इस प्यार भरी झिड़की को सुन कर अपने हाथों को माँ के चूतड़ों पर से हटा लिया और मुस्कुराते हुए माँ के चेहरे को देख प्यार से उसके गालों पर चुम्बन करके बोला- जैसी मेरी माँ की इच्छा।
और उसकी एक चूची को अपने हाथों से पकड़ कर दूसरी चूची से अपना मुँह सटा दिया और निप्पलों को मुँह में भर कर चूसने का काम शुरु कर दिया।
माँ की मस्तानी चूचियों के निप्पल फिर से खड़े हो गये और उसके मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगी। मैं अपने हाथों को उसकी एक चूची पर से हटा के नीचे उसकी जांघों के बीच ले गया और उसकी बुर को अपनी मुठ्ठी में भर के जोर से दबाने लगा।
बुर से पानी निकलना शुरु हो गया था, मेरी उंगलियों में बुर का चिपचिपा रस लग गया।
मैंने अपनी बीच वाली उंगली को हल्के से चूत के छेद पर धकेला, मेरी उंगली सरसराती हुई बुर के अन्दर घुस गई। आधी उंगली को चूत में पेल कर मैंने अन्दर-बाहर करना शुरु कर दिया।
माँ की आँखें एकदम से नशीली होती जा रही थी और उसकी सिसकारियाँ भी तेज हो गई थी।
मैं उसकी एक चूची को चूसते हुए चूत के अन्दर अपनी आधी उंगली को गचगच पेले जा रहा था।

माँ ने मेरे सिर को दोनों हाथों से पकड़ कर अपनी चूचियों पर दबा दिया और खूब जोर जोर से सिसकाते हुए बोलने लगी- ओह… सीई… स्स्स्स्स… एएयी… चूस, जोर से निप्पल को काट ले, हरामी, जोर से काट ले मेरी इन चूचियों को हाय!
और मेरी उंगली को अपनी बुर में लेने के लिए अपने चूतड़ों को उछालने लगी थी।
माँ के मुख से फिर से हरामी शब्द सुनकर मुझे कुछ बुरा लगा, मैंने अपने मुँह को उसकी चूचियों पर से हटा दिया और उसके पेट को
चूमते हुए उसकी फ़ुद्दी की तरफ बढ़ गया।

चूत से उंगलियाँ निकाल कर मैंने चूत की दोनों फांकों को पकड़ कर फैलाया और जहाँ कुछ सेकंड पहले तक मेरी उंगलियाँ थी, उसी
जगह पर अपनी जीभ को नुकीला करके डाल दिया।
जीभ को बुर के अन्दर लिबलिबाते हुए मैं भगनासा को अपनी नाक से रगड़ने लगा।

माँ की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी, अब उसने अपने पैरों को पूरा खोल दिया था और मेरे सिर को अपनी चूत पर दबाती हुई चिल्लाई- चाट साले, मेरी बुर को चाट, ऐसे ही चाट कर खा जा, एक बार फिर से मेरा पानी निकाल दे हरामी, बुर चाटने में तो तू पूरा उस्ताद
निकला रे! चाट ना अपनी माँ की चूत को, मैं तुझे चुदाई का राजा बना दूँगी, मेरे चूत-चाटू राजा… आआ साले।

माँ की बाकी बातें तो मेरा उत्साह बढ़ा रही थी पर उसके मुँह से अपने लिये गाली सुनने की आदत तो मुझे थी नहीं, पहली बार माँ के
मुँह से इस तरह से गाली सुन रहा था, थोड़ा अजीब-सा लग रहा था, पर बदन में एक तरह की सिहरन भी हो रही थी।

मैंने अपने मुँह को माँ की बुर पर से हटा दिया और माँ की ओर देखने लगा।
माँ के मजे में बाधा होने पर उसने अपनी अधखुली आँखे पूरी खोल दी और मेरी ओर देखते हुए बोली, ‘रुक क्यों गया चूतिये? जल्दी जल्दी चाट ना अपने मालपुए को।
मैंने मुस्कुराते हुए माँ की ओर देखा और बोला- क्या माँ, तुम भी ना? तुम्हें ध्यान है तुमने अभी अभी मुझे कितनी गालियाँ दी हैं? मैं जब याद दिलाता हूँ तो तुम कहती हो कि दी ही नहीं। अभी पता नहीं कितनी गालियाँ दे दी।

इस पर मेरी माँ हंसने लगी और मुझे अपनी तरफ खींचा तो मैं उठ कर फिर से उसके बगल में जाकर लेट गया।
माँ ने मेरे गाल पर अपने हाथों से एक प्यार भरी थपकी दे कर पूछा- चल मान लिया मैंने गाली दी, तुझे बुरा लगा क्या?
मैंने मुँह बना लिया था।

माँ मुझे बाहों में भरते हुए बोली- अरे मेरे चोदू बेटे, माँ की गालियाँ क्या तुझे इतनी बुरी लगती है कि तू बुरा मान कर रुठ गया?
‘नहीं माँ, बुरी लगने की बात तो नहीं है, लेकिन तुम्हारे मुँह से गालियाँ सुन कर काफ़ी अजीब सा लगा।’
‘क्यों अजीब लग रहा है, क्या मैं गालियाँ नहीं दे सकती?’
‘दे सकती हो, उसका उदाहरण तो तुमने मुझे दिखा ही दिया है। मगर अजीब इसलिये लग रहा है क्योंकि आज से पहले तुमको कभी गाली देते हुए नहीं सुना है।’

‘आज से पहले तुमने कभी मुझे नंगी भी तो नहीं देखा था ना? ना ही आज से पहले कभी मेरी चूत और चूची चूस कर मेरा पानी निकाला था। सब कुछ तो आज पहली बार हो रहा है इसलिए गालियाँ भी आज पहली बार सुन रहा है।’
कह कर माँ हंसने लगी और मेरे लंड को अपने हाथों से मरोड़ने लगी।
‘ओह माँ, क्या कर रही हो दुखता है ना? फिर भी तुम मुझे एक बात बताओ कि तुमने गालियाँ क्यों दी?’

‘अरे उल्लू, जोश में ऐसा हो जाता है। जब औरत और मर्द ज्यादा उत्तेजित हो जाते है ना तो अनाप-शनाप बोलने लगते हैं। उसी दौरान मुँह से गालियाँ भी निकल जाती हैं, इसमे कोई नई बात नहीं है, फिर तू इतना घबरा क्यों रहा है? तू भी गाली निकाल के देख, तुझे कितना मजा आयेगा?’
‘नहीं माँ, मेरे मुँह से तो गालियाँ नहीं निकलती।’
‘क्यों, अपने दोस्तों के बीच गालियाँ नहीं बकता क्या, जो नखरे कर रहा है?’
‘अरे माँ, दोस्तों के बीच और बात है पर तुम्हारे सामने मेरे मुँह से गालियाँ नहीं निकलती हैं।’

‘वाह रे मेरे शरीफ बेटे, माँ को घूर घूर कर देखेगा, माँ को नंगी कर देगा और उसकी चुदाई और चुसाई करेगा, मगर उसके सामने गाली नहीं देगा। बड़ी कमाल की शराफत है तेरी तो?’
‘क्या माँ, इस बात को गालियों से क्यों जोड़ के देखती हो?’
‘अरे क्यों ना देखूँ, जब हमारे बीच शर्म की सारी दीवारें टूट गई हैं और हम एक दूसरे के नंगे अंगों से खेल रहे हैं, तब यह शराफत का ढोंग करने का क्या फायदा, देख गालियाँ जब हम होश में हो तब देना या बोलना गुनाह है। मगर जब हम उत्तेजित होते हैं और बहुत जोश में होते हैं तो अपने आप ये सब मुँह से निकल जाता है, तू भी कर के देख।’

मैंने बात टालने की गरज से कहा- ठीक है, मैं कोशिश करूँगा पर अभी मैं इतने जोश में नहीं हूँ कि गालियाँ निकाल सकूँ।’
‘हाँ, बीच में रोक कर तो तूने सारा मज़ा खराब कर दिया, देख मैं तुझे बताती हूँ, गालियाँ और गन्दी गन्दी बातें भी अपने आप में उत्तेजना बढ़ाने वाली चीज है, चुदाई के वक्त इसका एक अलग ही आनन्द है।’
‘क्या सब लोग ऐसा करते हैं?’
‘इसका मुझे नहीं पता कि सब लोग ऐसा करते हैं या नहीं, मगर इतना मुझे जरूर पता है कि ऐसा करने में मुझे बहुत मज़ा आता है और शायद मैं इससे भी ज्यादा गन्दी बातें करुँ और गालियाँ दूँ तो तू उदास मत होना और अपना काम जारी रखना, समझना कि मुझे मज़ा आ रहा है और एक बात यह भी कि अगर तू चाहे तो तू भी ऐसा कर सकता है।’
‘छोड़ो माँ, मेरे से ये सब नहीं होगा।’
‘तो मत कर चूतिये, मगर मैं तो करुँगी मादरचोद।’
कह कर माँ ने मेरे लंड को जोर से मरोड़ा।

माँ के मुँह से इतनी बड़ी गाली सुन कर मैं थोड़ा हड़बड़ा गया था, मगर माँ ने मुझे इसका भी मौका नहीं दिया और मेरे होंठों को अपने होंठों में भर कर खूब जोर जोर से चूसने लगी।
मैं भी माँ से पूरी तरह से लिपट गया और खूब जोर जोर से उसकी चूचियों को मसलने लगा और निप्पल खींचने लगा, माँ ने सिसकारियाँ लेते हुए मेरे कान में फुसफुसाते हुए कहा- चूचियाँ मसलने से भी ज्यादा जल्दी मैं गन्दी बातों से गर्म हो जाऊँगी, मेरे साथ गन्दी गन्दी बातें कर ना बेटा।’

मैं उसकी चूचियों से खेलता हुआ बोला- तुम्ही करो माँ, मुझसे नहीं हो रहा है।
‘साले माँ की चूत चोदेगा जरूर, मगर उसके साथ इसकी बात नहीं करेगा, चुदाई के काम के वक्त चुदाई की बातें करने में क्या बुराई है बे चूतिये?’
‘हाँ हाँ माँ, चोदना तो मुझे है ही, इसके बिना कैसे रह रहा हूँ, सिर्फ मुझे ही पता है पर तुम्हारी ये गालियाँ देने की आदत ने मेरा सारा मजा खराब कर दिया।’
‘हाँ मेरे चोदू बेटा, तूने चाटना बंद कर दिया और ये फ़ालतू बातें करने लगा अब मेरा भी मन मर गया। चलो, सो जाते हैं। आज के लिए इतना ही सही। कल घाट पर जाना है अगर बारिश नहीं हुई तो ! पर यह जिस्म की गर्मी अभी भी बाकी है और नींद सता रही है, एक काम कर बेटा, जरा और चाट दे मेरी चूत, चटवाते चटवाते सो जाती हूँ।’

अब माँ की चूत की खुशबू से मैं और रोमांचित हो रहा था पर रात भी बहुत हो गई थी इसीलिए नींद लगने लगी। माँ तो जैसे अपने कामआनन्द में बेहोश या समझो सो चुकी थी, मैं भी रोमांचित होने की वजह से माँ से लिपट कर सो गया।

सुबह पहले माँ की नींद खुली, माँ ने मुझे भी उठाया, मेरी एक टांग और एक हाथ माँ के ऊपर थे। माँ ने मुझे बड़े प्यार से जगाया और कहा- चल बेटा, काम पर जाना है।

मैं उठा तो मेरा फनफनाता नाग मेरी चड्डी से लंबा खड़ा हुआ दिखाई दे रहा था, माँ उसे देख कर मंद मंद गालों में हँसी और उसके चेहरे पर चमक आ गई।
माँ बाहर झाड़ू लेकर आँगन में जाने लगी झाड़ू लगाने पर बाहर तो कल रात से मस्त हल्की हल्की बारिश चालू ही थी। माँ के दरवाजा खोलते ही ठंडी हवा और कुछ बारिश के हल्के फव्वारे माँ के बदन पर आये, मानो बारिश और हवा भी माँ को छूना चाहती हो।
और इस कारण पूरे घर में एकदम ताजा हवा और मस्ती छा गई और काम की भूख और बढ़ गई।

अब मेरा पेट में दर्द होने लगा, मैं आप घर की मोरी में संडास के लिए निकल गया। वहाँ माँ घर में झाड़ू लगाने लगी। मोरी में जाते ही में हल्की नींद में था और ठंडी हवा की वजह से अपनी ही वासना की और माँ के चूत का भूत बना हुआ था तो कड़ी लगाना भूल गया।

वहाँ माँ का झाड़ू लगाना हुआ और मेरा यह हगना ख़त्म हुआ। मैं अपनी गांड धोने के लिए झुकने वाला था तभी माँ मोरी में आई और मुझे देख कर थोड़ा अचंभित हुई इस हालत में, और थोड़ी मुस्कुराई भी… माँ कहने लगी- यह क्या कर रहा है तू हग भी करेगा अब मेरे सामने?
और हंसती हुई मेरे सामने पीठ करके मूतने बैठी। मैं माँ की मस्त गोरी गोरी गांड देखने लगा, मेरी गांड धोना भूल ही गया, सिर्फ एकटक माँ की ओर देखने लगा। माँ मस्त सुर-सुर करके मूतती रही।
सुरसुराहट और माँ की गोरी गांड में मेरा लंड फिर जोरों से खड़ा हो गया।
माँ का मूतना होते ही माँ मेरा लंड देख कर इठलाते हुए और कामुक हंसते हुए बोली- हाय माँ, क्या करूँ इस छोरे का इसका लंड बैठने का नाम ही नहीं लेता।
और हम दोनों एक दूसरे को देख कर हंसने लगे।
माँ ने कहा- बेटा याद है न, कैसे बचपन में मैं तेरी गांड धोया करती थी। आज भी मैं ही धोती हूँ तेरी गांड को।

मैं यह सुन कर हैरान हो गया पर खुश भी बहुत हुआ।
माँ मेरे सामने खड़ी हो गई और मैं नीचे झुककर अपना सर माँ की जांघों में लगा दिया और मेरी गांड उचका दी।
माँ मस्त पानी डाल कर अपनी बीच वाली उंगली से मेरी गांड धो रही थी।
मैं और माँ इस वाक़ये से काफी खुश थे।

अभी तो वैसे सुबह के 5 ही बजे थे।
माँ के मेरी गांड धोते ही मैं सीधा खड़ा हुआ तो माँ ने मेरे खड़े लंड को देखा और कहा- इसका इलाज आज करना ही पड़ेगा नहीं तो तू मेरी चूत के पीछे पागल हो जायेगा।

माँ ने मेरे कपड़े उतारे, अब मैं पूरा नंगा खड़ा था। नंगा होते ही मैं माँ के मस्त बड़े पपीते जेसे स्तन दबाने लगा।
अब माँ ने भी अपनी साड़ी निकाली और ब्लाउज भी उतारा। आप माँ के स्तन मेरे मुख के पास लटक रहे थे, मैं उन्हें दबाये जा रहा था।
अब माँ का पेटीकोट बाकी था, माँ एक हाथ से अपनी चूत रगड़ रही थी। मैंने पेटीकोट उतारने का प्रयास किया पर माँ ने मुझे रोक दिया
और रुकने को कहा।

मैंने कहा- माँ अब बस करो मुझे सताना और तड़पाना, मैं जबर्दस्ती चोद दूंगा तुम्हें!
माँ बोली- अरे हाँ मेरे लाल, मुझे पता है कि तू मेरी चूत देखने और मारने को बेताबी से तड़प रहा है पर अब मेरा भी पेट दर्द कर रहा है और मैं भी हग लूँ जरा, उसके बाद करते हैं नहाते नहाते!

मैं बोला- माँ, तुम भी मेरे सामने हगने बैठो, और मैं मेरे बाबा के दाढ़ी करने के फावड़े से तुम्हारी चूत के बाल निकालता हूँ।
माँ ने कामुक तरीके से हंस कर ‘हम्म हम्म…’ में जवाब दिया।

माँ तुरन्त अपना पेटीकोट निकाल कर हगने बैठी और मैं सब देखता ही रहा। माँ धीरे धीरे मूतने लगी, इस बार उसने सिर्फ थोड़ा सा ही मूता।
मैं तो कब से माँ की चूत देखने के लिए तरस रहा था, मेरे पैर जैसे जमीन पर चिपक गए, माँ की झांटों से भरी चूत देख कर।

माँ हगते हुए मेरा लंड और मेरा मुख देख रही थी, फिर बोली- बेटा, जल्दी अपने बाप का हजामत का फावड़ा ले कर आ, मेरी झांटें निकाल दे।
मैं तुरन्त वहाँ से नंगा भागा घर में और रेजर लेकर आया।

माँ अभी भी हग रही थी। मैं फावड़ा और नहाने का साबुन लेकर हगती हुई माँ के सामने बैठा। माँ की चूत तो अभी से पानी छोड़ रही थी।
मैंने कहा- माँ, यह इतना पानी कैसे? इतना कैसे मूत रही हो आज? क्या रोज हगते समय इतना मूतती हो?
माँ बोली- नहीं रे पगले, आज जिंदगी में पहली बार मैं अपनी झांटें साफ़ कर रही हूँ। इस वजह से यह कमीनी चूत पानी छोड़ रही है।

मैंने हंसते हुए नहाने के साबुन को माँ की चूत पर लगाया और वहाँ झाग बनाने लगा।
कुछ देर बाद मैंने फावड़ा चला कर पूरी झांटें साफ की और चूत को पानी से धोया।
धोते धोते मैं माँ की चूत को हल्का हल्का मसल रहा था, माँ गर्म हो रही थी, बोली- अरे कमीने, हरामी भोंसड़ी के, जरा रुक तो सही, क्या हगते हुए ही चोदेगा मुझे? जरा गांड तो धोने दे मुझे मेरी!
मुझे पता था कि माँ गर्म होती है तब गालियाँ देती हैं। मैं हंसते हुए अलग हुआ और माँ से कहा- लाओ माँ, मैं धो देता हूँ तुम्हारी गांड भी !कामुक हंसी हंसते हुए मेरी तरफ झुकी पर मेरा हाथ माँ की गांड तक नहीं पहुँच रहा था पर इस बार माँ ने तो और चौका दिया मुझे।
वो जब झुकी तो मेरे लंड की मादक खुशबू से और गर्म हो गई और मेरा लंड चूसने लगी, मैं भी और गर्म हो गया और माँ के स्तन दबाने लगा।

मैं तो मानी सातवें आसमान में था। पर माँ ने अब लंड चूसना बंद किया और मुझे कहा- अरे मेरे लाल, मेरी गन्दी हगती हुई गांड के साथ ही आगे का काम करेगा क्या? मैं घोड़ी बन जाती हूँ, तू पीछे से जा और गांड धो मेरी।
मैं पीछे गया और पानी डालकर माँ की गांड अपने हाथ से धोने लगा।

‘कितनी चिकनी गांड है माँ तुम्हारी! वाह मजा आ गया, और यह देखो तुम्हारी गांड का छेद कितना मस्त है, गोरी गोरी गांड की एक काली सुरंग।’
धोते धोते मैं माँ की चूत भी देख और धो रहा था पीछे से।
माँ हंसती हुई चिल्लाई- हुआ या नहीं मेरी गांड धोना, जल्दी कर।

अब मैं मेरे खड़े लंड के साथ माँ के सामने खड़ा था और माँ ने मुझे अपने नंगे गोरे बदन से चिपका लिया। हम मस्ती से एक दूसरे को सहला रहे थे। माँ के स्तन काफी बड़े लग रहे थे और सख्त भी, मेरा लंड तो जैसे माँ की जांघों में घुसे जा रहा था।

माँ तुरन्त नीचे बैठी और अपने दोनों पैर पसार कर मेरे सामने बैठी अपनी चूत दिखा रही थी।
मैं भी नीचे बैठा, माँ बोली- ले बेटा, तेरे खजाने का पिटारा तेरे लिए।
मैं तो देखता ही रहा माँ की चूत को, जहाँ से मैं निकला था।

अब माँ की चूत काफी सुंदर लग रही थी, मस्त गोरी गोरी और लाल लाल चूत, जब वहाँ झांटें थी तो कुछ ख़ास नहीं देख सकता था चूत को। अब मैं चूत की गंध से और कामुक होगया था, मैंने माँ की चूत चाटना चालू कर दी।
माँ कामुक आवाजें निकालने लगी- उईई ह्म्म्म्म आआ आओम्म्म म्म्म्मम्म… चाट मेरे लाल, चाट अपनी माँ की चूत को चाट, ऐसा ही मजा दूंगी तुझे रोज। मेरी जिंदगी बीत गई पर तेरे बाप ने मेरी चूत कभी नहीं चाटी। अम्म्म्म ऊऊओ ओओ आआआ चाट बेटा चाट अईई…

मैं मस्त माँ के स्तन दबा रहा था और मजा कर रहा था। माँ की चूत का स्वाद मस्त मादक चिकना खारा और लेसदार था। मैं पूरा पानी पीते जा रहा था।
अब एक मस्त बड़ा घूँट पानी निकला माँ की चूत से और मेरा मुँह पूरा भर गया उसके पानी से…
माँ हाँफने लगी और मैं उठ कर माँ के पास गया और उसके सामने अपना लंड लेकर खड़ा हो गया।

माँ ने कहा- मेरे बेटे का गधे जैसा लंड कितना मस्त है, ला मैं चूसती हूँ इसे।
और माँ मेरे लंड के साथ खेलने लगी और हिलाने लगी, कुछ देर में मेरा लंड चूसने लगी।
फिर मैंने माँ को वही पर चौड़े करने को कहा। मैं माँ के पैरों में जांघो में बैठा, मेरा लंड माँ ने हाथ में लेकर अपनी चूत पर रखा और मुझे झटका मारने के लिए कहा।
मैंने एक झटके में पूरा लंड माँ की चूत में घुसा दिया।
माँ जोर से चिल्ला उठी और उसकी आँखों से आंसू आने लगे।
मैं डर गया और झटके मारना बंद किये।
माँ कुछ देर वैसी ही पड़ी रही दर्द में, फिर मुझे कहा- अरे, मेरी जान लेगा क्या? जरा रहम के साथ कर ना ये सब धीरे धीरे!
मैं हल्का हल्का झटका लगाता रहा एक एक… माँ को अच्छा लगने लगा, फिर माँ बोली- थोड़ा जोर से कर अब!
मैंने गति बढ़ा दी और चोदने लगा।

माँ मदतमस्त होकर चिल्ला रही थी- आअ ईईईइ ऊऊऊ म्म्म्मम्म… चोद अपनी माँ को चोद हरामी चोद भड़वे! फाड़ दे मेरी चूत को आआम्मीईईई… ऊऊम्मम्म।

अब चोदते हुई मुझे 15 मिनट हुए थे, मैं झड़ने वाला था, मैंने कहा- माँ, मैं आने वाला हूँ।
माँ ने कहा- बेटा, आज बहुत सालों बाद इतनी मस्त चुद रही हूँ, मेरी प्यासी चूत को तेरा पानी पिला। मैं भी आने वाली हूँ… और जोर से ठोक मेरी… आआआम्मम्मीईई ईवव्वस्स स्सस्स म्म्मम्म…

मैंने कुछ झटकों के बाद अपना पानी माँ की चूत में झाड़ दिया। माँ और मैं हांफ़ते हांफ़ते वहीं मोरी में कुछ देर पड़े रहे और बाद में नहाने के बाद चाय नाश्ता करके दिन भर चुदाई की।

दोस्तो कॉमेंट्स में ब्ताओ आपको ये हिन्दी चुदाई कहानी कैसी लगी??

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