जिम्मेदारी (कुछ नयी कुछ पुरानी) -47

desi sex stories अध्याय 47
तेज गाड़ियों का काफिला तिवारियो के बंगले पर पहुच चूका था,ये बंगला कम और कोई किला सा ज्यादा लग रहा था,चारो ओर बस बंदूक लिए लोग मौजूद थे ,जो बस किसी के इशारे के इंतजार में थे की एक इशारा और गोलियों की बौछार हो जाय,बंगले के बाहर सभी गाड़िया रुक गयी और बंदूक धारी लोगो ने अपनी पोजीशन लेनी सुरु कर दी,अजय बिना किसी की परवाह किये सीधा गेट को एक लात मार कर खोल देता और अंदर आ जाता है,उसके साथ ही कुछ 50 की संख्या में लोग है जो विविध हथियारों से लेस है,सभी बंदूक धारी अपने अपने निशाने को सेट कर चुके थे,चाहे वो अजय के लोग हो या तिवारियो के सभी को पता था की किसे मरना है और कब मरना है ,हाथो में तलवार लिए लोग अपने प्रतिद्वंदी के आंखों में सीधे ही देखते हुए बढ़ रहे थे सभी को पता था की बस एक इशारा और खून की नदिया बहने वाली है………..
अजय विजय किशन सबसे आगे होकर चल रहे थे,तिवारि भी अपने घर के बाहर आ चुके थे,महेंद्र ,गजेंद्र ,बजरंगी,एक साथ खड़े थे वही रामचंद्र अपने वीलचेयर में बैठा था जिसे सुमन पकड़े थी ,निधि और धनुष घर की बाकी महिलाओं के साथ खड़े थे लेकिन सभी घर से बाहर आ चुके थे जैसे की वो इन्ही का इंतजार कर रहे हो ,विजय के इशारे से उसके सभी लोग थोड़ी दूर ही रुक गए लेकिन सभी विजय के एक इशारे के मोहताज थे ,वही तिवारियो के सभी लोग महेंद्र एक इशारे का इंतजार कर रहे थे,सभी ने अपने लक्ष्य साध लिए थे….
पीछे डॉ ,बाली और कलवा भी पहुच चुके थे और सभी अजय के बराबर में आकर खड़े हो गए….

बाली को देखकर गजेंद्र ने एक कातिल सी मुस्कान छोड़ी जिससे बाली का कालेजा ही जल गया,अजय और उनके बीच कुछ ही फासला रह गया था की अजय निधि को देखकर वही रुक गया ,निधि अजय को देखकर भागते हुए उसके पास आने लगी उसकी आंखों में बस आंसू थे ,उसने धनुष का हाथ पकड़ा और अजय के पास चली गयी ,…………..
अजय की आंखों से खून और पानी साथ ही निकल रहा था,वो लाल आंखे जो किसी को भी डरा दे,अजय ने पिस्तौल की नोक धनुष की ओर कर दी,धनुष और निधि अजय से कुछ एक हाथ की ही दूरी पर थे,
इससे पहले की कोई कुछ भी बोले निधि ने बंदूक की नोक अपने सर पर टिका दिया,
“भईया मैं अपनी मर्जी से यहां आयी हु ,”
अजय ने एक गर्जना की …
“तो फिर पहले तुझे मरूँगा “
बाली अजय के इस गुस्से को देखकर सहम गया ,लेकिन तभी एक और जोरो की गर्जना हुई जो गजेंद्र की थी ,
“खबरदार …ये तेरी बहन नही अब मेरी बहू है,इसे छूने से पहले तुझे मेरी लाश से गुजरना पड़ेगा.”
उस लंबे चौड़े आदमी की गर्जना से पूरा माहौल ही कुछ पलो के लिये शांत हो गया ऐसा लगा की उसकी आवाज अभी भी लोगो के कानो में गूंज रही हो ,
“क्या मेरे प्यार में कभी कोई भी कमी आयी थी जो तुने इतना बड़ा कदम उठा लिया,कितना प्यार किया था मैंने तुझे और तू इसके लिए मुझसे लड़ने को तैयार हो गयी है ….तुझे मा बाप सा प्यार दिया मैंने और तू ………..”
अजय के हाथ अब काँपने लगे थे ,निधि की वो प्यार से भारी हुई आंखे जिनमे बस प्यार के सिवाय कुछ भी ना था,वो बड़ी बड़ी आंखे आंसुओ से भरी थी जिनमें एक भी आंसू आता था तो जो भी अपने होठो से उसे पी लेता था आज वही उसके माथे में बंदूक टिका कर खड़ा था…….
तभी एक हँसी माहौल में गूंज गयी ,ये गजेंद्र ही था….वो बाली की तरफ मुखातिब हुआ

“देखा बाली एक भाई का प्यार देखा ,मैं भी अपने बहन को ऐसे ही प्यार करता था ,और तू और तेरा भाई इसीतरह मेरी प्यारी सी बहन को मुझसे दूर ले गए,याद है वो दिन जब मैं अपनी बहन के सर पर यू ही पिस्तौल टिका कर खड़ा था ,और वो वीर के सामने ऐसे ही खड़ी थी…..
बाली और गजेंद्र दोनो के आंखों में वो दृश्य घूम गया और दोनो की ही आंखे नम हो गयी ,गजेंद्र को निधि में अपनी बहन का चहरा दिख रहा था,उसके दिल ने अब सबर का बांध तोड़ दिया था और वो फुट फुट कर रोने लगा,
“नही अजय तू उसे नही मार पायेगा ,मैं भी नही मार पाया था ,मेरे भी हाथ यू ही कांप रहे थे जैसे की तेरे कांप रहे है……मैं भी तेरी मा से उतना ही प्यार करता था जितना की तू अपनी बहन से करता है……..मेरी बहन मेरी प्यारी बहन ,तुमने उसे मार डाला बाली तुम मेरे बहन के हत्यारे हो और अब ये मेरी बहु है देखता हु कौन इसे हाथ लगता है ”
माहौल में कुछ अजीब सी तब्दीली हो रही थी ,जो लोग गुस्से से भरे हुए हाथो में हथियार लेकर खड़े थे उनकी आंखे भी अब नम थी,
“आप नही मार पाए होंगे पर मैं इसे नही छोडूंगा,इसने मेरी इज्जत,से खेला है ,इसने मेरे भरोशे को चकनाचूर कर दिया,,,”अजय फिर से गरजता है और अपने हाथो और निधि के सीधा कर देता है ,तभी बाली दौड़ता हुआ आकर उसका हाथ नीचे कर देता है और एक जोर का झापड़ अजय के गालो में रसीद करता है ,
बाली गुस्से से भरा था पर उसकी आंखे कुछ अलग ही कहानी कह रही थी उसे वो लम्हा बार बार याद आ रहा था जब उसकी भाभी गजेंद्र के सामने वीर की रक्षा के लिए खड़ी थी और गजेंद्र इतना क्रूर होकर भी अपनी बहन पर गोली नही चला पाया था ,लेकिन आज अजय जो निधि पर अपनी जान छिड़कता था आज उसे मारने को उतावला है ,उसकी आंखे रोती नही तो क्या करती…
“तू अपनी बहन को मरेगा,जिसे तूने अपनी गोदी में खिलाया है उसे मरेगा तू ,एक गलती क्या उसने इतनी बड़ी कर दी ,क्या तेरी इज्जत तेरा प्यार इतना बड़ा हो गया की तू इसे मरेगा…..

क्या एक भाई जो अपनी बहन से प्यार करता हो वो उसे मार सकता है …”बाली ने गरजते अजय का गिरेबान पकड़ लिया ,
“हां चाचा सही कहा अपने ,”अजय की आवज अब कुछ धीमी थी
“एक भाई जो अपनी बहन से प्यार करता है वो उसे नही मार सकता,”
लेकिन फिर अजय गरजा …
“लेकिन ये बात आप लोगो को कौन समझायेगा जो दिल में नफरत की ऐसी आग लेकर चल रहे है…”बाली अब उससे अलग हो गया था ,और वो आश्चर्य से अजय को देख रहा था ,वही गजेंद्र भी उतने ही आश्चर्य से भरा हुआ था…
“यही तो मैं आपको इतने दिनों से समझा रहा था की मेरी माँ को इन्होंने नही मारा है,ये उनसे इतना प्यार करते थे की उन्हें मार ही नही सकते…और मामा आप(अजय गजेंद्र की तरफ देखता है ) ,आज बहन की बहुत याद आ रही है,बहुत प्यार उमड़ रहा है ,हम चार बच्चों को उसने जन्म दिया तब कहा थे आप,मेरे पिता पर आपने हमले करवाये ,तब कहा था आपका प्यार ,कभी अपने अहंकार को छोड़कर आप मेरी माँ से मिलने आये ,अभी ये जानने की कोशिस की कि आपके भांजे भांजियों कहा है,जिंदा है या मर गए ,अब याद करके रोने से क्या होगा मामाजी अगर अपने अहंकार छोड़ दिया होता तो शायद मेरी माँ और मेरे पिता दोनो ही इस दुनिया में होते….शायद हमारी इसी दुश्मनी का फायदा कोई और उठा ले गया…
और छोटे मामा(गजेंद्र का सबसे छोटा भाई जो की वीर की गोली से मारा गया था) को मेरे पिता ने नही मारा था ,वो एक गलती थी आप भी जानते ही की मेरे पिता ऐसे नही थे ,वो मेरी मा की खुसी के लिए जान भी दे सकते थे,सबको लगा था की छोटे मामा पिता जी की गोली से मारे गए पर वो गोली किसी और ने चलाई थी जिसका निशाना मेरे पिता थे,पर किश्मत से वो गोली मामाजी को लगी….अपने तो कभी उस पोस्टमार्टम रिपोर्ट को पढ़ने की भी जहमत नही उठाई होगी….”

अजय का इतना बोलना था की गजेंद्र और बाली की नजरे मिली जैसे की कोई बहुत पुरानी दीवार एक झटके में मोम सी पिघलकर बह गयी हो….गजेंद्र से रहा नही गया वो दहाड़े मार कर रोने लगा…इतना मजबूत दिखने वाला शख्स ऐसे रोयेगा किसे पता था ,सभी लोग जो वहां खून की होली खेलने आये थे वो अपने आंसू पोछ रहे थे….बाली आवक का गजेंद्र को देख रहा था ,वो कभी अजय को देखता तो कभी गजेंद्र को …गजेंद्र उठता है और बाली के गले से लग जाता है …बाली भी उसे ऐसे कसकर पकड़ लेता है जैसे उसे अपने बड़े भाई मिल गए हो,इतने दिनों की या कहे पीढियो की दुश्मनी ऐसे खत्म हो जाएगी किसी ने नही सोच था…दोनो अलग होते है,…
बाली अजय को देखता है,और अपनी आंसू पोछते हुए कहता है …
“जो हुआ उसे भूल जाओ अजय हम धनुष और निधि की शादी धूमधाम से कराएंगे ,”
“हा अजय जो गलती एक बार हमसे हुई थी वो दोहरानी नही चहिये “
अजय के होठो में एक मुस्कान आ जाती है ,वो निधि को देखता है ,निधि के आंखों में अब भी आंसू थे ,वो अपनी रोनी सी सूरत लिए बाली को देखती है ,
“किसकी शादी ,मैं तो अभी बच्ची हु ,और धनुष मेरा भाई है ,”
वो अजय को देखती है ,
‘अब बहुत हुआ भैया देखो आप ने मुझे कितना रुला दिया ,सच में कभी ऐसा हुआ तो आप मुझे मार दोगे “निधि की मासूमियत को देखकर अजय के दिल में एक प्यार की लहर सी उठ गयी और उसने उसका हाथ खीचकर अपने सीने से लगा लिया ,और उसके गालो और माथे को चूमने लगा जैसे की वो बहुत ही दिनों बाद उससे मिली हो…सच में अजय के लिए नाटक में भी निधि के ऊपर गुस्सा करना कितना कठिन था आज उसे पता चला ,और निधि भी अपने भाई के झूठे गुस्से को देखकर ही सचमे रो पड़ी थी जिसे देखकर अजय के हाथ काँपने लगे थे…
“नही मेरी जान मैं सपने में भी ये नही सोच सकता मेरी रानी “
गजेंद्र और बाली कभी एक दूजे को देखते तो कभी अजय और निधि को उन्हें तो अभी भी समझ भी आ रहा था की ये हो क्या रहा है,बजरंगी दौड़कर कलवा के गले लग जाता है और सुमन इन दोनो के वही विजय महेंद्र के गले से लग जाता है ,सभी के आंखों में आंसू थे ,रामचंद्र अपने परिवार को देखकर अपने आंसुओ को रोक ही नही पा रहा था ,धनुष उसके कंधे पर हाथ रखे खड़ा था,
‘ये हो क्या रहा है “बाली एक आश्चर्य भरे स्वर में कहता है ,

“आप दोनो को समझने के लिए बस एक छोटा सा नाटक “
महेंद्र अपने कानो को पकड़ता है ,और बाली के गले से लग जाता है ,
“लेकिन ये ….”
बाली उस लड़के की तरफ इशारा करता है जो खून से सना हुआ भागता खबर देने आया था,
“वो विजय भैया ने बोला तो ….”
उसके चहरे पर भी एक मुस्कान आ गयी और अब सबके चहरे पर मुस्कान आ गयी थी ,सब एक दूजे के गले से लग रहे थे….
अंत में अजय और सभी बच्चे रामचंद्र के पास पहुचते है वो सभी के गले से लगता है ,
“अजय आज तुमने वो पुरानी जिम्मेदारी निभा दी जो ना मैं निभा पाया था ,ना ही तुम्हारे माता पिता निभा पाए…बेटा तुमने दोनो परिवारों को एक कर दिया है “रामचंद्र उसके माथे को चूमता है…
“ऐसे ये आईडिया किसका था ,”बाली एक स्वाभाविक से प्रश्न करता है …..
“डॉ साहब का “
बाली और गजेंद्र सबसे दूर खड़े हुए डॉ को देखते है जो की अभी हल्के हल्के से मुस्कुरा रहा था…वो दोनो जाकर डॉ के गले से लग जाते है …….

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