जिम्मेदारी (कुछ नयी कुछ पुरानी) -43

chodan अध्याय 43
वक्त निकलने लगा था और निधि और सुमन दोनो ही कॉलेज जाने लगे थे ,विजय उनको छोड़ने और लेने जाता था लेकिन उसे काव्या से मिलने का मौका ही नही मिल पता,उसने देखा उसका नम्बर लिया और उससे बातें करने लगा,दोनो रात को घंटो ही बाते किया करते थे,लेकिन उससे आगे बढ़ने का समय ही नही मिल पा रहा था ,वही अब निधि के और नए भाई धनुष की भी उनसे बहुत जमने लगी थी ,ऐसे तो धनुष हमेशा से ही अकेले गांव में रहकर पला था और उसके खून में ही जमीदारो वाली बात थी पर वो निधि और सुमन के लिए बहुत ही सुलझा हुआ लड़का होता था,तीनो से कॉलेज के छात्र और यहां तक की टीचर भी घबराते थे ऐसे तो किसी को इनसे कोई भी प्रॉब्लम नही थी पर क्या करे लोगो को डरने की आदत पड़ चुकी थी,
कॉलेज को बने हुए पहला ही साल था पर वहां सभी इयर के बच्चों ने एडमिशन लिया हुआ था,जो बच्चे अभी तक शहर में पड़ रहे थे या कॉलेज नही जा सकने के कारण वहां की वो लडकिया जो डिस्टेन्स से पढ़ाई कर रहे थे सबके लिये ये कॉलेज एक उम्मीद ले के आया था ,वही एक और उम्मीद यहां पनप रही थी वो थी ठाकुरो और तिवारियो के सत्ता को तोड़कर अपनी नई सत्ता स्थापित करने का प्रयास………

ऐसे तो अभी तक ऐसा कुछ बड़ा प्रयास नही किया गया था और उसकी जरूरत भी बहुत ज्यादा नही थी पर लोगो के पड़ने के कारण और शहर से जो लड़के फिर से गांव आये थे उन्होंने एक नए वर्ग का निर्माण करना शुरू कर दिया था,वो वर्ग ना तो बहुत ही पढ़ा लिखा और ना ही अनपढ़ था ,ना ही ज्यादा गरीब था और ना ही ज्यादा अमीर एक मध्यमवर्ग का निर्माण एक नई क्रांति का संकेत था,ये किसी को मिटाना नही चाहते थे बस अपनी एक नई पहचान बनाना चाहते थे ,ऐसे तो अब बाजारों में बाहर और वही से आने वाले लोगो ने पैसे कमाने शुरू कर दिए थे और सर्विस क्लास लोगो की संख्या भी बढ़ गयी थी ,इसलिए अब ठाकुरो और तिवारियो के अलावा कई लोग ऐसे थे जिनके पास पैसा तो था,बहुत नही पर था,लोगो के पास कारे थी महंगी गाड़िया भी लोगो के पास थी ,वही घरों में उपयोगी सभी समान लोगो के पास आने शुरू हो गए थे ,लोगो के रिस्तेदार गवर्मेंट के अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक थे ,कुछ लोग राजनीति में भी अच्छा नाम कमा रहे थे ,मतलब की एक नए से और शक्तिशाली मध्यमवर्ग और निम्न उच्चवर्ग का उदय वहां हो रहा था………
सत्ता का टकराव अभी तक जो दो बिंदुओं के बीच था वो एक नए बिंदु की ओर बढ़ सकता है ये तो किसी को भनक भी नही थी पर पहली भनक पड़ी जब कॉलेज का इलेक्शन होने वाला था…पहला इलेक्शन था और वहां दोनो शक्तिशाली परिवार के बच्चे पढ़ रहे थे….
ये स्वाभाविक था की प्रेजिडेंट के लिए अगर वो खड़े हो जाते है तो कोई दूसरा खड़ा भी ना हो,लेकिन नया संघर्ष यही से शुरू हुआ जब धनुष ने फैसला किया की वो चुनाव में खड़ा होगा,उस कॉलेज में लगभग 15-20 गांव के लोग आते थे वही जहा वो कॉलेज था वो खुद एक विकसित कस्बा था,वहां के एक सेठ के बेटे अभिषेक ने भी फार्म भर दिया,वो लास्ट ईयर का स्टूडेंट था और शहर से यहां एडमिशन लिया था वहां उसे राजनीति की थोड़ी समझ भी थी,

सभी ने सोचा था की एकतरफा चुनाव होगा,पर भईया इंडिया डेमोक्रेटिक देश है….
माहौल में तनाव सा फैल गया और वहां के सभी पैसे वाले सेठ और बिजेनसमेन जो प्रायः वहां के मूल निवासी नही थे और ठाकुरो और तिवारियो से जिनका कोई मतलब नही था वो एक होकर अभिषेक का साथ देने लगे,बात छोटी सी थी पर अभिषेक राजनीति का पुराना खिलाड़ी रह चुका था और उसने छात्रों को इकट्ठा करने की अपनी कबिलियात को भुनाया और साथ ही अपने बाप की मदद से कॉलेज के बाहर भी अपना समर्थन खड़ा कर लिया,लोग बोलने लगे की एक आजाद देश में चुनाव में खड़ा होने का हक तो सभी को है तो क्यो हम ठाकुरो और तिवारियो के गुलाम बने फिरे,कॉलेज के चुनाव की बातें कॉलेज से निकालकर बाहर बाजारों और घरों में होने लगी अभी धनुष और अभिषेक ने बस अपना नामांकन डाला ही था लेकिन अभिषेक ने बातो को ऐसे फैलाया की सभी जगह गहमा गहमी सी फैल गयी थी ,बात इतनी फैली की सीधे महेंद्र तिवारी के कानों में पड़ी,बात बड़ी नही थी पर अपनी जमीदारो वाली शान का क्या करे,अगर सचमे धनुष चुनाव हार गया तो उनकी साख का क्या होगा,इससे उनकी इज्जत पर सीधे धक्का लगता,महेंद्र भी सोच में पड़ गया और उसने वही किया जो वो हमेशा से करते आ रहा था,अभिषेक के बाप के घर पहुचा और उसे चेतावनी दे डाली,लेकिन साला अभिषेक तो बड़ा खिलाड़ी निकल गया उसने ना सिर्फ उसका वीडियो रिकॉर्ड किया बल्कि वहां लोगो को इकठ्ठा कर लिया,ऐसे भी लोग तिवारियो से थोड़े से नाराज रहते थे और अब तो उनके पास एक नेता भी आ गया था जो खुद भी मारने को तैयार था और ऐसे भी अभिषेक ने पहले से ही सभी को भड़का के रखा था,सभी उसके समर्थन में कूद पड़े और महेंद्र को जनमत के सामने झुकना पड़ा और वहां से वापस आना पड़ा,
ये उसके लिए और भी बड़ी चोट थी क्योकि अभिषेक ना केवल उस वीडियो को फैला रहा था,वो भी फैला रहा था की देखो जिससे तुम डरते हो वो कुछ भी नही है मेरे घर में आया था और दुम दबा के उसे भागना पड़ा…..
इज्जत को बड़ा आघात लग रहा था और धनुष का हारना भी लगभग तय दिख रहा था,इससे ना केवल महेंद्र बल्कि धनुष भी टेंशन में रहने लगा,राजनीति की समझ ना होने से पॉवर खोखली से रह जाती है और डेमोक्रेटिक देश में पॉवर का उपयोग दिमाग से ही किया जाता है…
निधि को धनुष का ये चहरा देखे नही जाता था और साथ ही अब लोगो की हिम्मत भी बढ़ने लगी थी और ऐसे ही एक वाकये ने अजय विजय को मैदान में आने को मजबूर कर दिया…………………….