जिम्मेदारी (कुछ नयी कुछ पुरानी) -42

antarvasna अध्याय 42
अब थोड़ा आते है रेणुका और बनवारी की कहानी पर,
बनवारी गांव का एक सीधा साधा से लेकिन मजबूत लड़का था,अपने खेतो में वो बैलो की तरह मेहनत करता,अपनी सौतेली मा के तानो को नजरअंदाज कर अपने काम को मन लगा कर करने वाले बनवारी की ऐसे तो कोई भी बुरी आदत नही थी सिवाय की वो प्यार में था……किसके?????
बात उसकी शादी से दो साल पहले की है जब वो एक दिन अपने पिता किशोरीलाल और मा के साथ बाजार में कुछ समान लेने अपने गांव से ठाकुरो के गांव आया था,भारी भारी थैलो को बड़ी मुश्किल से सम्हालता हुआ बनवारी दोनो के पीछे चल रहा था की गांव के स्कूल की छुट्टी हुई और उसे स्कूल की ड्रेश में एक अप्सरा दिखी….उसके बदन और चहरे को देख बनवारी जैसे बूत बना वही खड़ा हो गया..लेकिन जैसे ही उसकी मा की नजर उस पर पड़ी उसके गालो में एक जोरदार चाटे की रसीद दे दी…
“कलमुहे हमारी जान लेगा क्या ,ठाकुर की बहन को ऐसे गुर रहा है”

उसने फुसफुसाते हुए कहा,बनवारी को जैसे कोई भी दर्द नही समझ आ रहा था वो तो बस उसके रूप यौवन में खोया था,लेकिन किशोरीलाल ने उसे झकझोर कर वहां से ले गया पर बनवारी के मन में वो प्रतिमा छप गयी और वो उसे पाने को बिल्कुल उतेजित सा हो गया,वो जब भी समय मिलता स्कूल पहुच जाता और बस दूर से ही उस हसीन से चहरे को घूरता रहता,धीरे धीरे उसे ये भी पता चल गया की जिसे वो पाना चाहता है उसका नाम निधि है और वो ठाकुर अजय की बहन है,जिनके नाम से सभी काँपते थे वो नाम उसेमें कोई भी दहसत पैदा नही कर पाते,लेकिन एक दिन उसकी इन हरकतों का पता किशोरीलाल को चला और उसने अपने बेटे को बैठा कर ठाकुरो की असली ताकत के बारे में बतलाया,तब से धीरे धीरे ही सही बनवारी को मजबूरन निधि को अपने दिल से निकलना पड़ा,लेकिन किसी को ना दिल में बसना अपने बस में होता है ना ही निकलना……..दिल के किसी कोने से एक टिस सी बनवारी को हमेशा ही सताती थी की काश वो उस हसीन ख्वाब को पा सकता ,उसे भी ये यकीन हो गया था की ये ख्वाब ही है लेकिन ख्वाब का अपना ही मजा होता है,
जब उसकी शादी रेणुका से तय हुई तो उसे जितनी खुसी अपने शादी की नही थी उससे ज्यादा खुशी उसे उस घर में रहने का हो रहा था ,वो सोचता था की चलो इसी बहाने ही सही निधि के रोज दर्शन तो हो जाएंगे…लेकिन रेणुका से उसकी शादी ने उसके मन को ऐसे ही बदल दिया जैसा की रेणुका के मन को बदल दिया,दोनो ही एक दूजे से मिलकर एक दूजे के प्यार में पड़ गए,
जहा रेणुका को बनवारी की सादगी और उसका इतना खयाल रखना भा गया वही बनवारी को रेणुका की खूबसूरती और प्यार ने मोह लिया ,दोनो ही एक दूजे के हो चुके थे,और एक दिन इसी प्यार के आगोश में आकर बनवारी ने रेणुका को अपने दिल की हर वो बात बता दी जो उसके दिल में निधि के लिए हुआ करता था,अपने पति की मासूमियत और सच्चाई से प्रभावित रेणुका भी उसे अपने और विजय के रिस्ते के बारे में बोल गयी ,दोनो ही एक दूजे के प्यार में ही रहना चाहते थे और ये उस प्यार के ही कारण था की दोनो ही एक दूजे के अतीत को भूलकर एक नई जिंदगी जीने की राह में चल पड़े………

जब रेणुका और बनवारी आकर ठाकुरो की हवेली में रहने लगे तब रेणुका को बस यही डर था की विजय उसे कुछ करने को ना कहे लेकिन वक़्त भी अजीब करवट ले रहा था और विजय रेणुका को लगभग भूल ही चुका था,इतने दिनों में विजय ने कभी भी रेणुका से संबंध बनाने की कोशिस नही की थी और रेणुका जानती की अगर विजय ने ये कोशिस की तो शायद वो उसे इनकार भी नही कर पाएगी….अपने पति को वो बहुत ही प्यार करती थी पर विजय उसकी आग को बढ़ाने और फिर अच्छे से बुझाने वाला शख्स था उसे मना करना रेणुका के लिए आसान तो बिल्कुल भी नही था…….
जो भी हो वक़्त बीत रहा था और एक दिनविजय और रेणुका का सामना हो ही गया…दोनो की आंखे मिली और रेणुका ने हँसकर उसका अभिवादन किया,
“कैसी हो तुम “
“अच्छी हु आप कैसे हो ठाकुर साहब “
“देख तो रही थी तेरे बिना तो मेरी राते ही सुनी हो गयी….”
रेणुका को एक करेंट सा लगा,वो अपनी आंखे नीची कर खड़ी रही ,
शायद विजय उसकी ये खामोशी समझ चुका था,
“ऐसे क्यो सर नीची कर ली,तू अब शादी शुदा है और मैं किसी भी बात के लिए तुझे जोर नही डालूंगा,शायद तू ये बात जानती है ,ऐसे तेरा पति कैसा है…”
विजय की बातो से रेणुका को थोड़ी सी राहत मिली और उसने अपना सर उठाकर उसे देखा और हल्के से मुस्कुराया
“अच्छे है ,…….बहुत अच्छे है’”
“ओहो ऐसे बहुत अच्छे है ,तुझे अच्छे से चोदता है की नही ,सचमे मुझसे भी अच्छा चोदता है “

रेणुका के लिए ये बहुत ही बडा प्रश्न था शायद बनवारी के प्यार ने उसे बदल दिया था नही तो ऐसी बातें तो विजय के साथ उसके रोज का काम था,
“क्या हुआ फिर से सर नीचे अरे यार आशिक नही दोस्त तो समझ सकती है ,ऐसे भी मैंने तुझे कहा ना की तुझसे कोई भी जबरदस्ती नही करूँगा..अब हस भी दे मेरी जान “
विजय ने उसके गालो को पकड़ कर उसे हिला दिया ,रेणुका हस पड़ी और बड़े ही गौर से देखने लगी…
“क्या सच में आप मुझसे सिर्फ दोस्त बनकर रह सकते हो …”
“ह्म्म्म पहले शायद नही रह पता पर कुछ दिनों से पता नही मेरे साथ क्या हुआ है की मुझे अब लड़कियों की इज्जत करने का दिल करता है”
रेणुका ने उसे थोड़े आश्चर्य से देखा और खिलखिला के हस पड़ी
“अच्छा सचमे”
विजय भी थोड़ा झूठे गुस्से में मुह बनाया और हस पड़ा,
“हा सचमे…लेकिन तुम उस चोमू के प्यार में कैसे पड़ गयी”
अब रेणुका ने झूठ गुस्सा अपने मुह पर लाया
“वो जैसे भी है पर सच में वो बहुत ही प्यारे है और मेरी बहुत ही फिकर करते है ,और हा आपके जैसा तो कोई मुझे नही कर सकता पर वो जितना भी करते है मैं उसमे खुश हु,सच में ठाकुर साहब मैं उनके साथ बहुत ही खुश हु….”बोलते बोलते रेणुका के आंखों में एक चमक सी आ गयी ,विजय भी अपना हाथ बढ़ाकर उसके सर को प्यार से सहला दिया और बड़े ही प्यार भारी आंखों से रेणुका को देखा ,
“हमारे बीच जो भी हुआ उसे अब भूलने का समय आ गया है ,और हा तुझे खुश देखकर मुझे बहुत खुशी हुई ,”
रेणुका विजय को अपनी ओर खिंच कर उसकी बांहों में समा गयी ,

“छोटे ठाकुर आप बहुत ही अच्छे हो मैंने कभी नही सोचा था की आप ऐसे मान जाओगे सचमे अगर आप जिद करते तो मैं आपने को कभी नही रोक पाती….मै हमेशा आपको अपना दोस्त मानूँगी सबसे अच्चा दोस्त,धन्यवाद छोटे ठाकुर अपने मुझे मेरी नजर में गिरने नही दिया…”
रेणुका के आंखों में आंसू था वही विजय के मन में एक अजीब सी खुशी थी वो कभी भी किसी लड़की के साथ जबरदस्ती नही करता था पर पहली बार उसके उसे एक अलग सी खुशी मिल रही थी जो कभी उसकी अय्याशी का समान थी आज वो किसी और की बीवी थी और उसे भी विजय बड़ी इज्जत से देख रहा था ……….
किसी ने सच ही कहा है की लडकिया प्यार करने ,इज्जत करने के लिए होती है आप उसे जितना प्यार और सम्मान दोगे उससे कही ज्यादा वो आपको लौटती है ,लडकियो से हिंसा और जबरदस्ती करने वाला तो मर्द ही नही होता…
आज विजय को असली मर्द होने का अहसास हुआ……..

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