जिम्मेदारी (कुछ नयी कुछ पुरानी) -41

hindi porn stories अध्याय 41
अजय अपने कमरे में बैठा बेचैन से इधर उधर झांक रहा था,निधि उसे ध्यान से देख रही थी,वो अपने हाथों में मोबाइल पकड़े कुछ सोच रहा था बेचैन सा था,
“क्या हुआ भईया, आप यू क्यो परेशान हो”
“ कुछ नहीं यार बस सोच रहा हूं कि दोनों परिवार को कैसे मिलाऊं डॉक्टर से कैसे बात करें, बाली चाचा को समझाना बहुत जरूरी है वह शायद ही इस बारे में मानेंगे,”
निधि अपने हाथ अजय के बाहों में डाल कर उसकी गोद में बैठ गई, अजय उसके बालों को सहलाने लगा,
“ भैया इसमें डरने वाली क्या बात हैं, चाचा आप की बात समझ जाएंगे मुझे इस बात का पूरा यकीन हैं, आप बस डॉक्टर से बात कीजिए और उसे समझाइए कि वह चाचा से बात करें,”
अजय ने हामी में सर हिलाया,और डॉ को काल लगाया,उसने आज होने वाली सभी बातें डॉ को बता दी…डॉ भी उसकी बाते सुनकर खुस हुआ और बाली से इस बारे में बात करने के लिए राजी हों गया,…

अजय को अब राहत महसूस हो रही थी वो जाकर निधि के बाजू में लेट गया,निधि एक प्यारा सा पारदर्शी स्कर्ट पहने हुए थी उसने बहुत से कपड़े खरीदकर शहर से लाये थे,जिसमे कुछ बहुत ही उत्तेजक थे,उसे इन सबका कुछ पता नही था वो तो बस खुला खुला रहना चाहती थी ,उसका बस चले तो पूरे घर मे नंगे घूमे पर क्या करे उसे भी जवानी की दहलीज पर इस बात का भान हो गया था कि उसका जिस्म अब पहले सा नही राह गया है,चोर नजरो से कुछ लोग उसे देख ही लिया करते है,ठाकुरो के घर की लड़की को घूरने की हिम्मत तो शायद किसी मे न थी पर जिस्म के आकर्षण से कोई कैसे बच सकता था,वही आकर्षण लोगो को उसे देखने पर मजबूर कर देता था,गोरा दमकता रंग,भरा हुआ शरीर ,भारी स्तन और पिछवाड़े ,मादक बड़ी बड़ी आंखे और लाल रसीले होठ…और अगर कोई उसके चेहरे पर नजर फेर दे तो बस वही रुक जाय,नशीली जवानी और मासूम सा चहरा कातिलाना कॉम्बिनेशन था,और वो दोनो निधि के पास था,लोग चाहकर भी उससे नजर नही हटा पाते,पर अजय विजय का ख़ौफ़ भी तो कातिलाना ही था….युही गांव ने नए जवान हुए लड़के निधि को अपने रातो की रानी माना करते थे,हर रात उसके नाम से ही वो अपना वीर्य छोड़ते चाहे वो हाथो में हो या किसी के अंदर…
उनमे ही पास के गांव का एक और भी बासिन्दा था जो निधि की मादकता में खोया था,पर ठाकुरो के डर से वो बेचारा उसे आंख उठाकर भी नही देख पाता….उसका नाम था बनवारी और अब वो रेणुका का पति था…इसकी कहानी बाद में अभी आते है अजय के कमरे में जहाँ हुस्न की मलिका और कई नवजवानों की रातो की रानी निधि अपने बड़े भाई से पूरे प्यार और समर्पण के साथ आलिंगन में थी,एक दूजे के अहसास में खोए हुए ये भाई बहन ऐसे तो अब एक दूसरे के शरीर का सुख भी भोग चुके थे पर वासना की आग ने अब भी इन्हें जलाया नही था….

वो अपने ही दुनिया मे रहने वाले लोग थे ,जो अपना प्यार समझते थे उनके बीच अब सामाजिक मर्यादा और बंधन नही थे,वो अपने नंगे जिस्म को एक दूसरे से छिपाते नही थे ना ही उसके प्रति राग से भरते थे,वो प्यार की नई परिभाषा गढ़ रहे थे जो दुनिया की नजरों में मान्य नही थी पर इनके लिए तो इनकी दुनिया ही थी……
निधि ने मचलते हुए अजय को अपने बांहो में भर लिया और उसके कानों के पास आकर हल्के से एक फूक मार दी,अजय गुदगुदी से हस पड़ा,और जोरो से निधि को अपने ऊपर भीच लिया,दोनो की नजरें मिली और एक दूसरे के होठो को मिला कर दोनो ने अपने दिल मे बसे प्यार का इजहार किया,..
उस कोमल नरम होठो की नाज़ुकता ने अजय को निधि को अपनी ओर और भी जोर से खिंचने को मजबूर कर दिया,दोनो जिस्म ऐसे मिले जैसे सदियों से प्यासे हो ,एक दूजे से इंच भर भी दूर रहना अब उनको गवारा नही था,निधि अपने होठो को अजय के अंदर धसाय जा रही थी और अजय उसके जीभ को खीचकर अपने जीभ से सहला रहा था…
स्कर्ट तो बस नाम की पहनी थी,अंदर से उसके जिस्म की एक एक करवट का पता अजय को अपने हाथों पर हो रहा था,उसने भी अपने को निर्वस्त्र किया और अपनी सबसे प्यारी बहन की जवानी को भीगने को तैयार हो गया,उस नाजुक सी अप्सरा के कसावो को छूता हुआ वो अपने लिंग को उसकी गीली योनि के पंखुड़ियों पर रगड़ने लगा,निधि ने भी अपने भाई के प्यार को अपनाने के लिए अपने कूल्हों को उचकाए पर लिंग था इतना बड़ा और योनि तो अभी अभी ही खुली थी,खून के भराव से फूली हुई उसकी योनि ने अपने सीमित जगह के कारण उसके लिंग को ठुकरा दिया,पर अजय ने अपने हाथों के सहारे फिर से उस कठोर से लोहे को इसके योनि की पंखुड़ियों के बीच लेजाकर उसे सहलाता हुआ उस छेद तक पहुचा जिसे लोग जन्नत का द्वार कहते है….
निधि की भगशिश्न(claitoris) रगड़ खाने से वो भी उसी नशे में थी जिसमे अजय था वो भी लगातार अपने कूल्हों को अपने भाई के कूल्हों पर रगड़ रही थी,प्यार की इस बेताबी ने आखिरकार अपना अंजाम ढूंढ ही लिया उस जन्नत की छेद में अजय ने अपने लोहे जैसे सरिये को हल्के से प्रवेश कराया,…

दोनो ने प्यार की एक चीत्कार लगाई और एक दूसरे के हो जाने के अहसास में डूब गए,जैसे जैसे अजय का लिंग निधि की गहराइयों में जा रहा था निधि अपने भाई के लिए असीम प्यार का अनुभव कर रही थी वो अपने को पूरी तरह से अजय को समर्पित कर रही थी तन से भी और मन से भी….

पूरी तरह अंदर जाकर अजय रुका और अपने बहन के गद्देदार नितंबो के मुलायमता को मसलता हुआ उसे अपनी ओर खींचा, दोनो कि नजरें फिर से मिली इस बार दोनो की आंखे आधी बंद थी,शायद दोनो ही एक दूजे को पूर्णतः नही देख पा रहे थे पर दोनो ही उस प्यार का ,उस एक होने के अहसास को बखूबी महसूस कर रहे थे ,दोनो इस मिलन पर खुद को भूलकर दूसरे के हो चले थे….

दोनो फिर से अपने होठो को एक दूजे के होठो की गहराई में धकेल दीया…

निधि ने अपने कमर को हल्के से हिलाया पर इस हिलाने से मिलने वाले सुख को वो सम्हाल ना पाई और अजय से जोरो से लिपट गई… ईस सुख की भी अजीब सी फितरत है इसे भी सहना पड़ता है और उसके लिए अपने प्यार के सहारे की जरूरत पड़ती है…

वो रगड़ इतनी उतेजक थी कि निधि के अंग अंग में एक सिहरन सी दौड़ पड़ी,वो फिर से मछली की तरह फड़फड़ाने लगी,अजय ने उसे अपने मजबूत बाजुओ में कस लिया,ये वही बाजू थे जिनमें वो दुश्मनों को कसकर मार डालता था आज वही अपनी नाजुक सी बहन को कसे था और वाह रे प्यार उसकी नाजुक कोमल सी बहन उसके बाजुओ में कसकर मर जाना चाहती थी,…

इसबार कमर अजय ने हिलाई थी एक एक वॉर दोनो की गहराइयों से निकलते प्यार की पैदाइश थी और दोनो को एक सुखद अहसास से भर देती थी,दोनो फिर एक दूजे के बाहों में जकड़ लेते,एक दूसरे में मिट जाने की तमन्ना ही ऐसे होती है,वो इतने जोरो से एक दूसरे को कसते जैसे सामने वाले में समान चाहते हो…

हल्के हल्के ही सही पर धक्के बढ़ने लगे ,कभी एक जोरदार से धक्का दिया जाता और पूरे कमरे में निधि की मादक चीख सी गूंज जाती,सुख की अभिव्यक्ति जब हो ही नही पाए तो या तो चीख बन जाती है या आंसू …आज दोनो ही निधि कें पास थे,वो सिसकियां लेती तो कभी चीखती आंखों में आंसू की बूंदे भी शोभा बड़ा रही थी ,वही हाल अजय का भी था,जिसके नाम से लोग काँपते थे वो आज खुद के मजे को काबू में नही कर पा रहा था होठो से सिसकियां निकल रही थी

“आह आह आह आह” बस “हा हा हा “ “नही हिहिहिहि “

ये शब्द कमरे में गूंज रहे थे,और दो नंगे जिस्म अपनी मस्ती में दुनिया को भूले हुए बस गुथे हुए प्यार का खेल खेल रहे थे…

आखिर जब अजय ने अपने प्यार की धार निधि के अंदर छोड़ी तो उसका गीलापन गाढ़ापन और गर्मी ने निधि को टूटने पर मजबूर कर दिया वो भी अजय को कसकर पकड़े हुए झरने लगी,दोनो ही रस एक साथ मिलकर निधि और अजय के उस जोड़ से बाहर को टपकने लगे ….

पर होश कहा था ,ये प्यार का कारवां था,जो चल निकला था तो आसानी से थमता नही…दोनो अब भी एक दूजे को खुद में समाए हुए थे और इस आनन्द से आनंदित हो रहे थे…